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पांडवों के अज्ञातवास का गवाह है सारंग माता का मंदिर:650 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित, 284 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु

कोटपूतली से 5 किलोमीटर दूर सरुंड गांव में स्थित सारंग माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर 650 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जहां पहुंचने के लिए भक्तों को 284 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं।

पांडवों द्वारा की गई थी स्थापना

मंदिर के पुजारी गोविंद शर्मा के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां चिलाय माता की स्थापना की थी। मान्यता है कि मुगल शासक अकबर ने प्रतिमा को नष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन माता की शक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने ही प्रतिमा पर गुंबद का निर्माण करवाया। मां दुर्गा के इस रूप को काली और महाकाली भी कहा जाता है।

सारंग माता के नाम पर पड़ा गांव का नाम

सारंग माता के नाम पर ही गांव का नाम सरुंड पड़ा। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को सात दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। भक्तों की सुविधा के लिए सीढ़ियों पर फाइबर शीट से छाया की गई है। यह मंदिर लगभग 5502 वर्ष पुराना माना जाता है।

नवरात्रि में लगता है विशेष मेला

नवरात्र के दौरान सप्तमी से नवमी तक तीन दिवसीय मेला भरता है। सप्तमी की रात जागरण का आयोजन होता है, वहीं प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष अष्टमी को भी जागरण किया जाता है। मंदिर का पाटोत्सव वैशाख शुक्ल षष्ठी से नवमी तक चार दिन तक मनाया जाता है।

अकबर को भी झुकना पड़ा था माता के आगे

एक किंवदंती के अनुसार, माता की मूर्ति को मदिरा का भोग लगाने की परंपरा थी। इस पर 16वीं सदी में मुगल बादशाह अकबर ने इस मान्यता की परीक्षा लेने के लिए ऊंटों पर मदिरा का जखीरा लेकर मंदिर की चढ़ाई शुरू की, लेकिन हर बार मंदिर की आधी चढ़ाई पर पहुंचते ही ऊंटों पर रखी मदिरा अपने आप खत्म हो जाती थी। यह चमत्कार देखकर अकबर को झुकना पड़ा और उसने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

गुफा में स्थित है माता की प्रतिमा

मंदिर की मूर्ति पहाड़ी की एक गुफा में स्थित है, जहां सात दरवाजों से होकर जाना पड़ता है। मान्यता है कि रात्रि में माता सिंह पर सवार होकर भ्रमण करती हैं। मंदिर की चढ़ाई के आधे रास्ते में माता के पद चिन्ह हैं, जबकि मंदिर के परिक्रमा मार्ग में 52 भैरव, 56 कलवा, 64 योगिनी, 9 नृसिंह और 5 पीर क्षेत्रपाल स्थित हैं।

500 वर्ष पुरानी बावड़ी और हनुमान मंदिर भी हैं आकर्षण का केंद्र

मंदिर परिसर में 500 वर्ष पुरानी बावड़ी, छतरी और गुफा के बीच हनुमान मंदिर भी स्थित है। इस मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा पांडवों के अज्ञातवास के दौरान स्थापित की गई थी। इस प्रतिमा के दर्शन के लिए व्यक्ति को लेटकर गुफा के अंदर प्रवेश करना होता है। मान्यता है कि इस गुफा में वर्षों पहले कई साधु-संत तपस्या कर चुके हैं।

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रोपवे ट्रॉली उपलब्ध

मंदिर तक निर्माण सामग्री व अन्य भारी सामान पहुंचाने के लिए रोपवे ट्रॉली की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर का सौंदर्यीकरण किया गया है। सीढ़ियों को फाइबर शीट से ढका गया है और रेलिंग लगाई गई है। नवरात्र अष्टमी को यहां विशेष भीड़ उमड़ती है।

देशभर से आते हैं श्रद्धालु

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सारंग माता करीब 100 गांवों की कुलदेवी हैं। यहां दिल्ली, कोलकाता, जयपुर, नारनौल, पाटन, सीकर, अलवर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

सारंग माता मंदिर: शक्ति उपासना का ऐतिहासिक केंद्र

सारंग माता मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। नवरात्रि और अन्य पर्वों पर यहां बड़ी संख्या में भक्तजन माता के दर्शन के लिए आते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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