जयपुर में सिटी पैलेस से रविवार शाम 5:30 बजे तीज माता की सवारी निकाली जाएगी। इसके लिए शहर में जगह-जगह ट्रैफिक डायवर्ट किया जाएगा। तीज माता की सवारी के कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों के लिए पार्किंग की जगह भी निर्धारित की गई है। जो शाम 5 बजे से लागू होगी।
दरअसल, जयपुर में 27 जुलाई को तीज और 28 को बूढ़ी तीज की सवारी निकलेगी। जो जनानी ड्योढ़ी से रवाना होकर त्रिपोलिया बाजार, छोटी चौपड़, गणगौरी बाजार होते हुए चौगान स्टेडियम पहुंचेगी। इस दौरान लोगों को परेशानी न हो, इसके लिए ट्रैफिक प्लान बनाया गया है।
जयपुर में क्या रहेगी ट्रैफिक व्यवस्था…
तीज माता की सवारी सिटी पैलेस के जनानी ड्योढ़ी से होते हुए चांदनी चौक और त्रिपोलिया गेट से नगर भ्रमण के लिए रवाना होगी। इस दौरान सिटी पैलेस की ओर आने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया जाएगा।
बसों के लिए की गई व्यवस्था
सागानेरी गेट से सुभाष चौक, सुभाष चौक से सांगानेरी गेट आने व जाने वाली बसें घाटगेट, घाट बाजार, रामगंज चौपड़, चार दरवाजा होकर सुभाष चौक आ-जा सकेंगी। रामगंज चौपड़ की तरफ से बड़ी चौपड़ होकर चलने वाली बसें घाट बाजार, घाटगेट से सांगानेरी गेट, एम.आई. रोड आ सकेंगी।
हरियाली तीज पर्व की मान्यता
प्रोफेसर विनोद शास्त्री ने बताया- तीज माता मां पार्वती ही है। तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, जो आमतौर पर जुलाई या अगस्त के महीने में आता है। यह तीन दिन का त्योहार है। पहले दिन सिंजारा, दूसरे दिन हरियाली तीज और तीसरे दिन बूढ़ी तीज मनाई जाती है।
सिंजारा तीज से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन विवाहित महिलाओं को उनके मायके से उपहार के रूप में घेवर, लहरिया साड़ी, मेहंदी, चूड़ियां, और अन्य श्रृंगार सामग्री भेजती है।
भविष्य पुराण में देवी पार्वती बताती हैं कि सावन की तृतीया तिथि का व्रत उन्होंने बनाया है जिससे स्त्रियों को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि हरियाली तीज के दिन माता पार्वती और शिव जी की आराधना सच्चे मन से करने से मनोकामना जरूर पूरी होती है। अगर आप भी हरियाली तीज का व्रत इस बार रख रही हैं, तो इस व्रत कथा को जरूर पढ़ें, क्योंकि हरियाली तीज व्रत कथा के बिना व्रत पूरा नहीं माना जाता है।
हरितालिका व्रत की कथा
कहा जाता है इस व्रत के महात्म्य की कथा भगवान शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण करवाने के मकसद से इस प्रकार कही थी-
हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में तुमने अन्न नहीं खाकर केवल हवा का ही सेवन किया था। इतनी अवधि तुमने सूखे पत्ते चबाकर खाए थे। माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था।
वैशाख की जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहण किए व्यतीत किया। तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज होते थे। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराजगी को देखकर नारद जी तुम्हारे घर पधारे।
तुम्हारे पिता ने आने का कारण पूछा तो पर नारद जी बोले- ‘हे गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां आया हूं। आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं।
इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं। नारद जी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- श्रीमान यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है।
वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-संपदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। नारद जी तुम्हारे पिता के स्वीकृति पाकर विष्णु जी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का समाचार सुनाया, लेकिन जब तुम्हें इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हारे दुख का ठिकाना नहीं रहा।
तुम्हें इस प्रकार से दुखी देखकर तुम्हारी एक सहेली के तुम्हारे दुख का कारण पूछने पर तुमने बताया मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है, लेकिन मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णु जी के साथ तय कर लिया है। मैं विचित्र धर्म संकट में हूं।
अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा। तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी। उसने कहा प्राण छोड़ने का यहां कारण ही क्या है। संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए। भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मनुष्य के रूप में एक बार वरण कर लिया जीवन पर्यंत उसी से निर्वाह करें।
सच्ची आस्था और एक रिश्ता के समक्ष तो भगवान भी असहाय है। मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूं, जो साधना स्थल भी है और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने ऐसा ही किया।
तुम्हारे पिता तुम्हें घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए। इधर, तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं। तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुंचा और तुमसे वर मांगने को कहा।
तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने सामने पाकर तुमने कहा, मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया।
उसी समय पर्वतराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहां पहुंचे। तुमने सारा वृतांत बताया और कहा कि मैं घर तभी जाऊंगी, अगर आप महादेव से मेरा विवाह करेंगे।
तुम्हारे पिता मान गए और उन्होंने हमारा विवाह करवाया। इस व्रत का महत्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मनवांछित फल देता हूं। इस पूरे प्रकरण में तुम्हारी सखी ने तुम्हारा हरण किया था, इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत हो गया।





