भरतपुर में भुसावर के पहाड़ी क्षेत्रों में खनन लगातार जारी है। खनन के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में बने मंदिरों में दरार आ गई हैं। इसके कारण कालिया बाबा पहाड़ पर साधु-संतों का आमरण अनशन सोमवार को आठवें दिन भी जारी है।
साधु-संतों का कहना है कि अलीपुर में कालिया बाबा उर्फ काला पहाड़ एक धार्मिक पहाड़ है। हर अमावस्या को श्रद्धालु इसकी परिक्रमा करते हैं। इसे पूजने की भी मान्यता है। इसके बावजूद यहां खनन के लिए लीज आवंटित की गई हैं। इन लीज को ही रद्द करने की मांग की जा रही है
हालांकि स्थानीय लोग लीज धारकों के समर्थन में उतर आए है। लोगों का कहना है कि लीज के आने से लोगों को रोजगार मिलेगा। लोगों ने घरों के टूटने अथवा दरार आने की बात को भी नकार दिया है।
तहसीलदार राजेंद्र मीणा ने बताया- आंदोलन स्थल पर जाकर साधु संत और लोगों से बात कर रहे हैं। सरकार द्वारा 13 नई लीज आवंटित की जा रही हैं। इसका आवेदन ऑनलाइन किया गया था। जिसमें से 9 लीजों को आवंटन हो चुका है, बाकी 4 लीजों का आवंटन फिलहाल नहीं हुआ है।
9 सितंबर से साधु संत आंदोलन पर बैठे हैं। आसपास के स्थानीय लोग भी इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं। आज फटी कूट पहाड़ पर एक सभा हो रही है। जिसमें करीब 50 साधु संत सहित लोग पहुंचे हुए हैं।
कलुआ बाबा ने बताया कि, प्रशासन द्बारा 13 नई लीज आवंटित की जा रही है। उन लीजों के आवंटन को रोक दिया जाए। क्योंकि सरकार 13 नई लीज और बढ़ाएगी तो, कालिया पहाड़ का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। आसपास के लोग कालिया पहाड़ की पूजा करते हैं।
वहीं स्थानीय व्यक्ति बाबू लाल ने बताया कि मेरे घर की दीवार बारिश के कारण गिर गई थी। उसे आंदोलन करने वाले लोगों ने गलत तरीके से पेश करते हुए बताया कि वह लीज पर होने वाले धमाके से गिरी है। जबकि लीज से मेरा मकान काफी दूर है।
काला पहाड़ पर हनुमान मंदिर है आस्था का केंद्र
भरतपुर-अलवर-दौसा जिले की सीमा पर पथैना गांव से करीब 3 किमी दूर काला पहाड़ की तलहटी में स्थित धनेरी गुफा वाला हनुमान मंदिर आस्था का केंद्र है। ऐसा माना जाता है कि यह गुफा भगवान श्री कृष्ण-बलराम युग की है। इसे द्वारिकाधीश का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। मंगलवार, शनिवार के अलावा अमावस्या और पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
551 दिन किया था आंदोलन, संत ने दी जान
करीब 2 साल पहले 20 जुलाई 2022 को भरतपुर के पसोपा गांव में संत बाबा विजय दास ने अवैध खनन के विरोध में खुद को आग लगा ली थी। वे भरतपुर के कनकांचल और आदिबद्री को वनक्षेत्र घोषित करने की मांग को लेकर साधु-संतों के साथ 551 दिन से आंदोलन कर रहे थे। तत्कालीन सरकार के आश्वासन के बाद साधु-संतों ने आंदोलन खत्म कर दिया था। एक दिन बाद सरकार ने अवैध खनन वाली जमीन को वन विभाग को ट्रांसफर कर दिया। 23 जुलाई को इलाज के दौरान संत की मौत हो गई।





