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मैं अखबार हूँ

कविता: मैं अखबार हूँ

सत्ता और जनता के बीच कभी तल्ख तकरार हूँ
करा सकूँ वंचितों को न्याय की नदिया पार
मैं ऐसी पतवार हूँ

वैसे तो सुबह पैदा होके शाम तक मर जाता हूँ
फिर बिछ जाता हूँ कहीं रोटियों या कपड़ों के नीचे
कहीं रोटियों को भींच के दे दिया जाता हूँ किसी भूखे को
मैं ऐसा भी मददगार हूँ

फिर रिसाइकल होके बनता हूँ लुगदी
देखो मैं भी पर्यावरण प्रेमियों की छोटी कतार में हूँ
जब तुम ऊंघते हो बिस्तर में
तब मैं तुम्हारे सीढ़ियों पे पड़ा कोई पहरेदार हूँ

नील आंदोलन में “हिंदू पैट्रिएट” बनकर या कभी “नवीन”
कभी “तरुण” बिजौलिया में किसानो की दुर्दशा कहने वाला
मैं ही वो इतिहासकार हूँ

’बंगाल गजट’ से मजहरुल-सरूर से अब तक न जाने कितनी उठापटक देखी है मैंने
रियासत से सियासत, अदावत से बगावत
हां मैंने लिखा है, बेबाक होके लिखा है
मैं ऐसा भी “खुला दरबार” हूँ

मैं ’तिलक’ का “संवाद कौमुदी”
तो बेसेंट का इंडियन ओपिनियन
इतिहास के हर पन्ने पे दर्जा पा सकू
मैं इतना तो असरदार हूँ

1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों को
दिया जाने वाला शाब्दिक हथियार हूँ
डगमगा जाते है मेरी खबर से सत्ता या सिंहासन
मै ऐसा भी पैनीदार हूँ

मैं सागरमल गोपा की काली कोठरी की
चीखों में उपजा “जैसलमेर का गुंडा राज” हूँ
मैं ’बीकानेर एक दिग्दर्शन’ हूँ
मूक होकर शब्दों से कर दू वध
मैं कृष्ण की सुदर्शन फटकार हूँ

1992 का “अजमेर स्कैंडल” में बचा न सका
अनगिनत बेटियों की आबरू
बाल बाल तक कर्जदार हूँ।
मैं इस पे आज भी शर्मसार हूं ।

कहने को तो बेच दिया जाता हूँ मैं
कबाड़ी की दुकान पे किलो के भाव से
मैं ऐसे ही छोटे मोलभाव का शिकार हूँ

कभी बिक जाता हूँ मैं छपने से पहले
भ्रष्टाचार की हवा का मैं भी तलबगार हूँ।
चढ़ जाता है मुझे भी मौसमी बुखार
कभी मैं भी “पीत पत्रकारिता“
तो कभी पैड न्यूज का शिकार हूँ।

युवा को दिशा देना हो या बुजुर्गों को अकेलेपन से निजात
मैं ऐसा भी तीमारदार हूँ
सरहद हो या सरजमीं
सीमा पे मौजूद फौजी के शरीर से बहते
मैं बेहिसाब पसीने का कर्जदार हूँ

सफ़ेदपोश लोगों के दामन पे लगे
लांछन को जनता को दिखा सकूँ
मैं इतना तो फरमाबदार हूँ
मैं निर्भीक ,निडर और निर्भय हूँ
आतंक के आकाओं तक पहुंच जाता हूँ
मैं कितना फनकार हूँ

मैं लड़ता हूँ शब्दों की युद्ध भूमि में हर दिन
‘उमा’ सच कहूं, किसी रंगमंच का कलाकार हूँ
अगर समझ सको तुम मुझे तो
मैं कोई तेजधार तलवार हूँ

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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