झारखंड का पलामू प्रमंडल लतागार सुखाड़ से जूझता आ रहा है। सूखे की स्थिति को देखते हुए सिंचाई साधनों को उपलब्ध कराने के लिए पलामू में कई लाभकारी योजनाओं को शुरू किया गया, ताकि इस क्षेत्र में हरित क्रांति लायी जा सके। इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी कृषि कार्य से जुड़ी हुई है, जिसमें लाखों की संख्या में कृषि मजदूर कार्यरत हैं। यहां की भूमि पर अन्न की अधिक पैदावार नहीं हो रही है। राहर, उरद, बराई, बादाम आदि मिश्रित बीजों का आच्छादन यहां किया जाता है सिंचाई सुविधा के अभाव में कृषकों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार बड़े पैमाने पर यहां कृषि कार्य किये जा रहे हंै लेकिन इस जिले का दुर्भाग्य है कि सूखा पड़ने के कारण किसानों की खेती मारी जाती है । आजादी के बाद सिंचाई सुविधा के नाम पर पलामू व गढ़वा जिले में काफी मात्रा में छोटे व मझोले बांध बनाये गये, लेकिन ये संसाधन पूरी तरह से मानसूनी वर्षा पर पूर्णरूपेण आश्रित हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पलामू में 1954-55 से 1964-65 के मध्य निर्मित वीयर स्कीमों का विवरण इस प्रकार था (डालटनगंज में डालटनगंज सदर और सबडिवीजन के अधीन सदावह वीयर स्कीम, डडही वीयर स्कीम, गढ़वा जिला के अधीन अन्नराज वीयर स्कीम, बांकी वीयर स्कीम, कंवल दोग वीयर स्कीम, षिवपुर वीयर स्कीम, व लातेहार जिला के अन्तर्गत चोका वीयर स्कीम, घाघरी वीयर स्कीम, रामघाट वीयर स्कीम के तहत कार्य किया गया था। इन सभी योजनाओं के क्रियान्वयन से पलामू की अकाल पीड़ित जनता ने राहत महसूस की भी लेकिन उनकी समस्या का पूर्णरूपेण निदान नहीं हो सका, क्योंकि इन योजनाओं को जल्दीबाजी में बिना किसी सर्वे काम के राजनीतिक दबाव में आकर जितनी शीघ्रता से प्रारम्भ किया गया, उतनी ही शीघ्रता से पूर्ण भी घोषित कर दिया गया। इस जल्दीबाजी में बहुत से कार्यों का विधिवत संपादन नहीं हुआ फलस्वरूप आरम्भ में हुई ये सभी योजनााएं अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहीं। इन सभी योजनाओं के असफल होने का एकमात्र कारण राजनीतिक दबाव के तहत कार्यरूप देना ही पलामू में अधिसंख्य योजनाएं हड़बड़ी में जिस तरह शुरू हुई, उसी तरह शीर्घता से पूर्ण भी घोषित कर दी गई । प्रारंभ कोई भी कार्य विधिवत तरीके से संपादित नहीं हो सका। नहरों व शाखा नहरों का भी निर्देशानुसार निर्माण नहीं हो पाया और सब कुछ अधूरा ही रह गया । पलामू प्रमण्डल का दुर्भाग्य है कि राज्य गठन के 25 साल बीत जाने के बाद भी यहां पर सिंचाई योजनाएं धरातल पर उतारी नहीं जा सकी हैं। वहीं पलामू के लोग वर्ष 1942, 1947, 1962, 1967, 1971 व 1993 का सूखा का दंश झेल चुके हैं। बावजूद अब तक कोई भी कारगर पहलकदमी नही की गई है।





