मदारी गैंग के बच्चा चोरी करने का मामला ठंडा पड़ा ही था कि साेमवार को एक और बच्चा चोरी हो गया। एक तरफ बच्चे की बरामदगी के लिए पुलिस सीसीटीवी खंगाल रही थी, दूसरी तरफ दैनिक भास्कर टीम ने शहर के 30 किमी क्षेत्र के 6 डेरों में पहुंची।
अब सवाल यह उठता है कि जयपुर में बसे इन डेरों में ये लोग कहां से आए और कब से रह रहे हैं। यहां तक कि इनके साथ रह रहे बच्चों के बारे में पूछा तो खुद का बताया, मगर उनकी पहचान के लिए कुछ नहीं बता पाए। झुग्गियों में रहने वाले अधिकतर लाेग बागरिया, बावरिया, सांटिया, कंजर जाति के हैं, जाे गुब्बारे-खिलाैने बेचकर, बूट पाॅलिस कर, शादियों में केटर्स व लाइटें उठाने के साथ सफाई का काम करते हैं।
बच्चे-महिलाएं भीख भी मांगते हैं। वहीं जीआरपी काेटा ने काेटा रेलवे स्टेशन से चुराए बच्चे काे 14 मई काे विद्याधर नगर की झुग्गी बस्ती से बरामद किया था, इसके बाद यहां रह रहे लोग निकल गए। गौरतलब है कि सोमवार शाम को जवाहर सर्किल के पास एमपी के झाबुआ निवासी दंपती के 9 माह के बेटे को चुरा लिया था।
विद्याधर नगर : 170 परिवारों वाला सबसे बड़ा डेरा यही
विद्याधर नगर अलका सिनेमा के सामने करीब 2:30 बजे पहुंचे। यहां पर करीब 170 परिवार राेड किनारे रह रहे हैं, उनमें करीब 800 लाेग हैं। पहले ये परिवार नगर निगम के कचरा डिपाे परिसर में रहते थे। जीताराम, सुखराम, सूंडा देवी का कहना है कि वे मूलत: हनुमानगढ़, चूरू व गंगानगर के रहने वाले हैं। उनको यहां रहते 35 साल हाे गए। रोजगार की तलाश में जयपुर आए थे। उन्हाेंने बताया कि यहां रहने वाले 13 परिवार के पास ही पहचान के लिए आधार कार्ड हैं। उन्हाेंने 30 साल से किसी भी चुनाव में वाेट नहीं डाला।
अशोक मार्ग, सरदार पटेल मार्ग – करीब 80 बच्चे, चौराहों पर खिलौने बेचते हैं
भास्कर टीम अशोक मार्ग और सरदार पटेल मार्ग स्थित डेरे में पहुंची। यहां पर तेजू बागरिया के साथ अन्य परिवारों से बात की तो बताया कि 20 से ज्यादा परिवार 15 साल से इन डेरों में रह रहे है। दिनभर आसपास के चौराहों पर दिनभर गुब्बारे बेचते हैं। जब उनसे आधार-जनाधार के बारे में पूछा तो कहा-उन्हें पता ही नहीं ये क्या होते हैं? यहां पर सभी परिवारों में बच्चे थे, लेकिन उनकी पहचान के लिए भी किसी प्रकार के कार्ड नहीं था।
बाइस गोदाम – बिना पहचान के 40 परिवार, ज्यादातर राजसमंद, भीम, बर और ब्यावर के
दैनिक भास्कर टीम ने मंगलवार दोपहर 12 बजे 22 गोदाम पुलिया के नीचे डेरे में एनजीओ के सदस्य बनकर पहुंचे। कंजर जाति के सुरेश लाल, राजेश लाल, भगवान दास, नाेरत ने बताया कि हम राजसमंद, भीम, बर और ब्यावर के रहने वाले हैं।
उन्होंने बताया कि करीब 40 परिवार 22 गोदाम पुलिया नहीं बनी थी, उसके पहले से यहां रहते आ रहे हैं। उनके दादा तक गांव के पहचान के राशन कार्ड थे, अब उनके पास आधार, जनाधार, बैंक खाते नहीं है। वे बूट पाॅलिश करने के साथ शादियों में काम कर परिवार चलाते हैं। उन्हाेंने बच्चाें काे स्कूलाें में अब भी दाखिला नहीं करवाया।
बी-टू बायपास और द्वारका दास पार्क : बच्चे बता नहीं पाए कि कहां के रहने वाले हैं?
पीछे डेरे, आगे सड़क किनारे खिलौने बेचने की दुकानें लगा रखी हैं
करीब 5:30 बजे बी-टू बायपास पर डेरे में पहुंचे। पीछे डेरे, आगे सड़क किनारे खिलौने बेचने की दुकानें लगा रखी हैं। यहां एक एनजीओ की दो युवतियां बच्चों को पढ़ा रही थीं। उनसे जब बच्चों की पहचान के बारे में पूछा तो बताया कि इनकी पहचान के लिए कोई दस्तावेज नहीं है, वहीं परिवारों ने कहा- बच्चे हमारे ही है। इसके बाद शाम 6 बजे द्वारका दास पार्क स्थित डेरे में गए तो बच्चे खिलौने बेचते मिले। उनसे पूछा तो वे नहीं बता पाए कि कहां के रहने वाले हैं? यहां भी लोगों के पास पहचान के लिए कोई दस्तावेज नहीं थे।





