राजस्थान की सियासत में आज जो नेता एक-दूसरे को हराने की कसमें खा रहे हैं, वो कभी एक-दूसरे के जिगरी हुआ करते थे। परिवारों में अच्छी सियासी दोस्ती थी। किसी के बीच गुरु-चेले जैसा रिश्ता था तो कोई किसी का हमराज होता था।
प्रदेश की 7 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव की घोषणा के साथ ही उन नेताओं की अदावतें भी सामने आने लगी हैं। आज सियासी दोस्ती से ज्यादा उनकी अदावत के किस्से मशहूर हैं।
मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए- हनुमान बेनीवाल- रेवतराम डांगा, करीबी परिवार रहे मिर्धा-बेनीवाल और सियासी गुरु-चेले का रिश्ता रखने वाले किरोड़ीलाल और नरेश मीणा की अदावतों की कहानी…
सबसे पहले बेनीवाल V/S डांगा की कहानी…
कभी खींवसर में हनुमान बेनीवाल का चुनावी कैंपेन संभालने वाले और रात-दिन एक कर उनकी जीत सुनिश्चित करने वालों में रेवंतराम डांगा का नाम सबसे पहले आता था। आज उन्हीं रेवंतराम डांगा की आरएलपी से सियासी अदावत चर्चा में रहती है।
डांगा ने विधानसभा चुनाव 2023 में हनुमान बेनीवाल के सामने बीजेपी से चुनाव लड़ा था। एक बार फिर बीजेपी ने रेवंतराम डांगा पर दांव खेलकर हनुमान बेनीवाल और उनकी पार्टी की चुनौतियां बढ़ा दी है।
खींवसर में डांगा के कद और प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने अजेय दुर्ग में ही हनुमान बेनीवाल पिछला विधानसभा चुनाव हारते-हारते बचे थे। बेनीवाल को महज 2069 वोटों से जीत नसीब हुई थी।
तीन पीढ़ियों से जुड़ा बेनीवाल और डांगा का सियासी रिश्ता
दोनों ही नेताओं के करीबी लोगों ने हमें बताया कि हनुमान बेनीवाल के पिता और पूर्व विधायक रामदेव बेनीवाल से रेवंतराम डांगा के दादा बींजाराम डांगा का गहरा जुड़ाव था। बींजाराम डांगा 5 बार सरपंच और एक बार उप प्रधान रहे थे। उन्होंने साल 1977 से हर बार विधानसभा चुनावों में रामदेव बेनीवाल का साथ दिया था। साल 1995 में दादा बींजाराम का निधन होने के बाद उनके पोते रेवंतराम डांगा साल 1996 से रामदेव बेनीवाल और उनके बेटे हनुमान बेनीवाल के साथ पॉलिटिक्स में एक्टिव हो गए थे।
राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति में सफल होने के बाद हनुमान बेनीवाल ने साल 2005 में जिला परिषद से चुनाव लड़ा तो रेवंतराम डांगा उनके साथ मुख्य सिपहसलार बनकर उभरे।
जहां-जहां बेनीवाल वहीं डांगा, पार्टी बनाई तब भी साथ रहे
डांगा बेनीवाल के साथ पॉलिटिक्स में हर कदम पर साथ रहे। खींवसर विधानसभा क्षेत्र को वोटों की रणनीति के हिसाब से दो बेल्ट में बांटा- थली (रेगिस्तानी) और सालग बेल्ट (सिंचाई क्षेत्र) है। सालग बेल्ट का जिम्मा हर बार रेवंतराम डांगा संभालते। हनुमान बेनीवाल अपना पूरा फोकस थली बेल्ट के वोटरों को लुभाने में रखते। यही वजह है कि बेनीवाल ने 2008 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर खींवसर विधानसभा सीट से जबरदस्त जीत हासिल की।
साल 2013 में तत्कालीन सीएम वसुंधरा राजे से अनबन और भारतीय जनता पार्टी में अनदेखी के बाद बेनीवाल ने खींवसर सीट से निर्दलीय ताल ठोकी। तब उनके चुनाव प्रचार का जिम्मा छोटे भाई नारायण बेनीवाल और रेवंतराम डांगा के कंधे पर ही था। इस बार भी बेनीवाल ने जोरदार जीत हासिल की। इस बीच रेवंतराम डांगा दो बार सरपंच चुनाव जीत गए थे।
साल 2018 आते-आते बेनीवाल ने अपनी खुद की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) बनाने का निर्णय कर लिया। पार्टी की पहचान बनाने के लिए हनुमान बेनीवाल खींवसर से बाहर निकले। तब खींवसर में पूरा पॉलिटिकल मैनेजमेंट नारायण बेनीवाल और रेवंतराम डांगा सहित कुछ दूसरे चुनिंदा लोगों के पास ही था। यही कारण है कि अधिकतर समय प्रदेश भर में प्रचार में रहने के बावजूद बेनीवाल साल 2018 का विधानसभा चुनाव आसानी से जीत गए
बेनीवाल विधायक रहते सांसद बने, खाली हुई सीट पर छोटे भाई को लड़ाने से शुरू हुई अनबन की कहानी
जानकार बताते हैं, साल 2019 तक हनुमान बेनीवाल और रेवंतराम डांगा के बीच एक-दूसरे पर विश्वास की कोई कमी नहीं थी। चुनाव रणनीति के दोनों ही महारथी आंखों से ही एक दूसरे के इशारे समझ लेते थे। दोनों के बीच अनबन तब शुरू हुई, जब हनुमान बेनीवाल के सांसद बनने पर खाली हुई खींवसर विधानसभा सीट पर उनके भाई नारायण बेनीवाल को प्रत्याशी बनाया गया। जबकि रेवंतराम डांगा को उम्मीद थी कि उन्हें प्रत्याशी बनाया जाएगा।
बेनीवाल की पार्टी आरएलपी के भीतर भी कई लोग इसकी मांग भी कर रहे थे, लेकिन टिकट पाने में डांगा पिछड़ गए। नारायण बेनीवाल कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री हरेंद्र मिर्धा के सामने उपचुनाव में काफी नजदीकी मुकाबले में चुनाव जीते। नारायण चुनाव जरूर जीते, लेकिन जीत का मार्जिन महज 4 हजार 630 वोटों का था।
खुलकर अनबन शुरू, रेवंतराम डांगा ने पत्नी को प्रधान बनाया
इधर, साल 2020 में रेवंतराम डांगा ने मूंडवा पंचायत समिति में RLP का बहुमत नहीं होने के बाद अपने दम पर जोड़-तोड़ कर पत्नी गीता देवी डांगा को प्रधान बनवा दिया। यहीं से रेवंतराम डांगा की आरएलपी से अनबन खुलकर सामने आई। रेवंतराम के भतीजे नरेश डांगा ने हमें बताया कि ये वो दौर था जब उनके पिता रेवंतराम डांगा की आरएलपी पार्टी में अनदेखी स्टार्ट हो गई थी। उनके बताए जनहित के काम नहीं किए जा रहे थे या उनमें अड़ंगा लगाने के प्रयास हो रहे थे।
कुछ लोग बताते हैं- कई मौकों पर रेवंतराम डांगा की बेइज्जती के प्रयास भी किए गए। आखिरकार परेशान होकर डांगा ने साल 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आरएलपी पार्टी छोड़ बीजेपी जॉइन कर ली। बीजेपी ने भी उन्हें खींवसर विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी बना हनुमान बेनीवाल के सामने ही मैदान में उतार दिया। इस चुनाव में पहली बार बेनीवाल को जोरदार टक्कर मिली। हालांकि वो अंत में 2069 वोट से चुनाव जीत गए
एक बार फिर बीजेपी ने 13 नवंबर को होने वाले उपचुनाव में खींवसर सीट से डांगा पर ही दांव खेला है। बेनीवाल और उनकी पार्टी के पत्ते खुलना अभी बाकी है। जानकार बताते हैं कि इस बार बेनीवाल को डांगा कि चुनौती से पार पाना आसान नहीं होगा, वो भी तब जब उन्हें डांगा के सामने खुद के अलावा किसी दूसरे प्रत्याशी को चुनाव लड़ाना है।
डांगा को ज्योति मिर्धा का साथ
रेवंतराम डांगा RLP पार्टी में हो रही अपनी अनदेखी के चलते पहले से ही वहां से बाहर निकल भगवा पार्टी में जाने की राह तलाश रहे थे। हालांकि तब तक उन्हें उनके भविष्य को लेकर कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल पा रहा था। इस बीच कांग्रेस से नागौर की पूर्व सांसद रहीं ज्योति मिर्धा भी भाजपा में शामिल होने की तैयारी कर रही थी। जब उन्हें ये पता लगा कि बेनीवाल के गढ़ खींवसर के एक मजबूत सिपहसलार मूंडवा प्रधान प्रतिनिधि रेंवतराम डांगा बेनीवाल से छुटकारा पाना चाह रहे है तो उन्होंने तुरंत ही उन्हें अपने पाले में लेने के प्रयास कर दिए।
बीजेपी में आने के काफी समय पहले ही ज्योति मिर्धा एक दूसरे सिपहसलार जगदीश बिड़ियासर को तो खींवसर प्रधान चुनाव में कांग्रेस के 6 सदस्यों का खुला सपोर्ट देकर अपने साथ ला चुकी थी। अब बस उनको भी डांगा के साथ बीजेपी में शामिल होना था। विधानसभा चुनाव 2023 से एक महीना पहले ज्योति मिर्धा और डांगा की मौजूदा चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर और उनके बेटे धनंजय सिंह खींवसर से मीटिंग हुई और आखिर में जयपुर में तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी के हाथों दोनों की बीजेपी में एंट्री हो गई।
जॉइनिंग के बाद बीजेपी ने ज्योति मिर्धा को हनुमान बेनीवाल को घेरने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद भाजपा ने नागौर से ज्योति मिर्धा और खींवसर से रेंवतराम डांगा को प्रत्याशी बनाया। चुनाव के दौरान ज्योति मिर्धा की पूरी टीम और उनके लोगों ने खींवसर में डांगा के पक्ष में जोरदार मेहनत की। हालांकि डांगा मामूली अंतर से हार गए। अब एक बार फिर डांगा को टिकट मिला है।
अब समझिए डांगा के पीछे खड़ी ज्योति मिर्धा की बेनीवाल से अनबन की कहानी…
हनुमान बेनीवाल और ज्योति मिर्धा। दोनों के बीच सियासी अदावत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले विधानसभा चुनावों में ज्योति मिर्धा की हार पक्की करने के लिए बेनीवाल ने नागौर सीट से अपनी पार्टी का प्रत्याशी तक नहीं उतारा था।
एक जमाना था जब ज्योति मिर्धा के दादा नाथूराम मिर्धा और हनुमान बेनीवाल के पिता रामदेव बेनीवाल नागौर में अपनी-अपनी सियासत करते थे। दोनों परिवारों में कभी कोई अदावत भी नहीं थी। हनुमान बेनीवाल और ज्योति मिर्धा के बीच भी हमेशा से सियासी दुश्मनी नहीं थी। बेनीवाल तो खुद ये बात कई मंच पर कह चुके हैं कि 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज्योति मिर्धा की मदद की थी। तभी वो सांसद बन पाई थीं। इस बात की दबी जुबान में हबीबुर्रहमान भी तस्दीक करते हैं।
नाथूराम मिर्धा ने साल 1985 में मेड़ता सीट से लोकदल के टिकट पर MLA चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा में पहुंचे। इसी साल रामदेव बेनीवाल भी लोकदल के टिकट पर ही मूंडवा से विधायक चुनाव लड़े और जीतकर पहली बार विधायक बने थे। तब दोनों एक ही पार्टी से जुड़े थे। साल 1989 में नाथूराम मिर्धा ने जनता दल का दामन थाम लिया था। उनके एक साल बाद 1990 के विधानसभा चुनावों में रामदेव बेनीवाल ने भी लोकदल का साथ छोड़ जनता दल का दामन थाम लिया, लेकिन वह जीत नहीं पाए।
बेनीवाल और मिर्धा परिवार में क्यों शुरू हुई अदावत?
हनुमान बेनीवाल खुद ये बात मानते हैं कि साल 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने और डीडवाना के तत्कालीन विधायक रूपाराम डूडी ने ज्योति मिर्धा की मदद की थी और वो चुनाव जीतीं। जानकार मानते हैं कि ज्योति मिर्धा के पहली बार सांसद बनने के बाद उन्होंने बेनीवाल और डूडी को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, जो धीरे-धीरे पहले पंचायती राज चुनाव और बाद में जिला प्रमुख के चुनावों में खुलकर सामने आने लग गया था।
नागौर जिला प्रमुख के चुनाव में ज्योति मिर्धा की सिफारिश पर कांग्रेस का टिकट उनके चाचा रिछपाल मिर्धा को मिल गया था। इस फैसले से न सिर्फ बेनीवाल और डूडी नाराज थे बल्कि दूसरे दावेदार हरेंद्र मिर्धा के बेटे रघुवेन्द्र मिर्धा और सहदेव चौधरी भी नाराज हो गए। इस नाराजगी के चलते कांग्रेस के बहुमत के बावजूद रिछपाल मिर्धा क्रॉस वोटिंग के चलते भाजपा की बिंदु चौधरी के सामने हार गए।
यहीं से सियासी अदावत की ये कहानी शुरू हो गई थी। इसके बाद भी दोनों ही तरफ से कभी भी इस अदावत को कम करने के प्रयास नहीं हुए। उल्टा एक-दूसरे को खत्म करने के लिए सियासी चालें चली गईं। हनुमान बेनीवाल अपनी राजनीतिक सूझबूझ से आगे निकल गए। वहीं, ज्योति मिर्धा भितरघात के चलते हारती चली गईं।
बेनीवाल और मिर्धा परिवार में क्यों शुरू हुई अदावत?
हनुमान बेनीवाल खुद ये बात मानते हैं कि साल 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने और डीडवाना के तत्कालीन विधायक रूपाराम डूडी ने ज्योति मिर्धा की मदद की थी और वो चुनाव जीतीं। जानकार मानते हैं कि ज्योति मिर्धा के पहली बार सांसद बनने के बाद उन्होंने बेनीवाल और डूडी को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, जो धीरे-धीरे पहले पंचायती राज चुनाव और बाद में जिला प्रमुख के चुनावों में खुलकर सामने आने लग गया था।
नागौर जिला प्रमुख के चुनाव में ज्योति मिर्धा की सिफारिश पर कांग्रेस का टिकट उनके चाचा रिछपाल मिर्धा को मिल गया था। इस फैसले से न सिर्फ बेनीवाल और डूडी नाराज थे बल्कि दूसरे दावेदार हरेंद्र मिर्धा के बेटे रघुवेन्द्र मिर्धा और सहदेव चौधरी भी नाराज हो गए। इस नाराजगी के चलते कांग्रेस के बहुमत के बावजूद रिछपाल मिर्धा क्रॉस वोटिंग के चलते भाजपा की बिंदु चौधरी के सामने हार गए।
यहीं से सियासी अदावत की ये कहानी शुरू हो गई थी। इसके बाद भी दोनों ही तरफ से कभी भी इस अदावत को कम करने के प्रयास नहीं हुए। उल्टा एक-दूसरे को खत्म करने के लिए सियासी चालें चली गईं। हनुमान बेनीवाल अपनी राजनीतिक सूझबूझ से आगे निकल गए। वहीं, ज्योति मिर्धा भितरघात के चलते हारती चली गईं।
नरेश मीणा ने बताया कि डॉ. किरोड़ीलाल मीणा से उनका बहुत पुराना जुड़ाव रहा है। कई सामाजिक आंदोलनों में उनका खुलकर सपोर्ट भी किया है। संघर्ष की राजनीति भी उन्हीं से सीखी है। वो बताते हैं कि साल 2017 के अक्टूबर महीने में जयपुर में हुई मीणा समाज की एक रैली में तो उन्होंने लाखों की भीड़ के सामने अपना अंगूठे पर कट लगाकर किरोड़ीलाल मीणा का खून से तिलक किया था। इस बात से किरोड़ीलाल उन पर नाराज भी हो गए थे।
इसके बाद से उन्हें अपने सियासी गुरु किरोड़ीलाल से भी कई मौकों पर संघर्ष करना पड़ा है। दौसा में उनके सत्याग्रह आंदोलन को विफल करवाना, उनका 7 दिन तक जेल जाना और साल 2017 में मंडावर में उन पर हुआ कातिलाना हमला सबके सामने है। इसके बाद भी वो डॉक्टर किरोड़ीलाल की संघर्ष की राजनीति का सम्मान करते हैं।





