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गहलोत ने जहां जिले बनाए, वहां BJP को ‘दोगुनी’ सीटें:8 नए जिलों में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई, BJP 51 में से 29 पर जीती

कांग्रेस राज में बने 3 संभाग और 9 जिले खत्म करने पर राजस्थान में सियासत गरम है। जब गहलोत सरकार ने 17 नए जिलों की घोषणा की थी, तब विपक्ष में बैठी बीजेपी ने आरोप लगाया था कि सियासी फायदा उठाने के लिए मापदंड दरकिनार कर नए जिले बनाए गए हैं। अब सत्ता में आई बीजेपी की भजनलाल सरकार ने उनमें से 8 जिलों को यथावत रखा है। इसके पीछे भी अपने करीबी नेताओं को सियासी फायदा देने की बातें कही जा रही हैं।

नए जिलों का असली सियासी फायदा किसे मिला? भास्कर ने इसका विधानसभा चुनाव 2023 और 2018 के नतीजों के साथ तुलनात्मक एनालिसिस किया। सामने आया कि गहलोत सरकार ने जहां 17 जिले घोषित किए, वहां की 51 विधानसभा सीटों पर बीजेपी को 2018 की तुलना में 2023 में लगभग दोगुनी सीटों पर जीत मिली। खुद के बनाए 8 जिलों में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई थी।

मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

गहलोत राज में जहां नए जिले बनाए, वहां बीजेपी को फायदा, दोगुनी सीटें मिलीं चुनावी साल में नए जिले बनाने का सौदा कांग्रेस के लिए कितना फायदेमंद रहा? विधानसभा चुनाव के नतीजों से साफ पता लगाया जा सकता है। जहां 17 नए जिले बनाए गए, वहां विधानसभा की 51 सीटों में बीजेपी को 2018 की तुलना में लगभग दोगुनी सीटों पर जीत मिली। बीजेपी ने 51 में से 29 सीटों पर कब्जा जमाया। कांग्रेस ने 20 और 2 सीट पर निर्दलीयों ने जीत हासिल की।

इसके उलट 2018 के विधानसभा चुनाव में इन्ही 51 सीटों में से 26 कांग्रेस ने जीती थी। बीजेपी 15 सीटों पर रही, 4 पर बसपा, एक पर RLP और 5 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी जीते थे।

 

8 नए जिलों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया गहलोत सरकार में बने 8 नए जिलों में तो कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला पाया था। इनमें कोटपूतली-बहरोड़, शाहपुरा, ब्यावर, डीग, फलोदी, दूदू, केकड़ी और सलूंबर शामिल हैं। इनमें से शाहपुरा, दूदू और केकड़ी को छोड़कर मौजूदा भजनलाल सरकार ने बाकी 5 जिलों को यथावत रखा है।

अब सिलसिलेवार जानते हैं गहलोत सरकार में बने सभी 17 नए जिलों के क्या नतीजे रहे…

जयपुर ग्रामीण : कांग्रेस को 3 विधानसभा क्षेत्र की सीटों का फायदा, बीजेपी को एक सीट का नुकसान जयपुर ग्रामीण जिले की 7 सीटों में से कांग्रेस ने 5 और बीजेपी ने 2 सीटें जीती। 2018 में यहां बीजेपी ने 3 और कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थीं। 2 विधानसभा क्षेत्र की सीट पर निर्दलीय जीते थे। 2023 में कांग्रेस को तीन सीटों का फायदा हुआ।

 

कोटपूतली-बहरोड़ : चारों सीटों पर कांग्रेस हारी कोटपूतली-बहरोड़ जिले की चारों सीटों पर 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हारी, जबकि ​2018 में यहां बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था। कांग्रेस ने 3 सीटें और एक सीट निर्दलीय ने जीती थी। जिला घोषित करने के बाद 2023 में यहां कांग्रेस का खाता नहीं खुला।

दूदू, केकड़ी, सलूंबर : तीनों छोटे जिलों में कांग्रेस का खाता ही नहीं खुला कांग्रेस नए बनाए गए तीन छोटे जिलों में चुनाव हार गई। मुख्यमंत्री के सलाहकार बाबूलाल नागर के दबाव में केवल एक उपखंड वाले दूदू को जिला बनाया गया था, लेकिन यहां से कांग्रेस हार गई। केकड़ी से पूर्व मंत्री रघु शर्मा और सलूंबर से रघुवीर मीणा चुनाव हार गए।

2018 में सलूंबर से बीजेपी, केकड़ी से कांग्रेस और दूदू से निर्दलीय की जीत हुई थी। सलूंबर में बीजेपी विधायक अमृतलाल मीणा के निधन के बाद उपचुनाव हुआ। गौर करने वाली बात ये है कि उपचुनाव में भी इस सीट से बीजेपी ने जीत दर्ज की। कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहा।

डीडवाना-कुचामन : 2023 में कांग्रेस को एक सीट कम मिली डीडवाना-कुचामन जिले की पांच सीटों में से 2018 की तुलना में कांग्रेस को 2023 में एक सीट का नुकसान हुआ। 2023 में 3 कांग्रेस, एक बीजेपी और एक निर्दलीय को मिली। जबकि 2018 में चार सीट कांग्रेस और एक बीजेपी को मिली थी।

अनूपगढ़ : दोनों सीट कांग्रेस ने जीती अनूपगढ़ और रायसिंहनगर दोनों ही सीट 2018 में बीजेपी ने जीती थी। 2023 में कांग्रेस ने जीती।

सांचौर : जिला बनने के बावजूद मंत्री रहे सुखराम हारे, दो में से एक सीट कांग्रेस को जिला बनाने के बावजूद गहलोत सरकार में मंत्री रहे सुखराम बिश्नोई 2023 में सांचौर से चुनाव हार गए। दो में से एक सीट रानीवाड़ा कांग्रेस जीती, सांचौर में निर्दलीय। बीजेपी यहां खाता नहीं खोल पाई। 2018 के चुनाव में भी कांग्रेस को एक सीट सांचौर पर जीत मिली थी।

नीमकाथाना : कांग्रेस-बीजेपी को बराबर 2-2 सीटें नीमकाथाना में 2023 में कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ने 2-2 सीटें जीतीं। 2018 में यहां बीजेपी खाता भी नहीं खोल पाई थी। कांग्रेस ने तीन और बसपा ने एक सीट पर कब्जा जमाया था। हालांकि उदयपुर वाटी से जीते बसपा विधायक बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

डीग-कुम्हेर : कांग्रेस का खाता नहीं खुला, 2018 में सभी 3 सीटें कांग्रेस के पास थीं डीग कुम्हेर जिले में 2023 के चुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। डीग, नगर और कामां तीनों सीटों पर कांग्रेस हारी और बीजेपी जीती। 2018 में इनमें एक भी सीट बीजेपी के पास नहीं थी, दो पर कांग्रेस और एक पर बसपा जीती थी।

खैरथल-तिजारा : 3 में से 2 सीटें कांग्रेस ने जीती खैरथल जिले में तिजारा, मुंडावर और किशनगढबास सीटें आती हैं, 2023 के चुनाव में कांग्रेस ने मुंडावर और किशनगढबास सीट जीती। तिजारा सीट से बीजेपी के महंत बालकनाथ जीते। 2018 में दो सीट बसपा और एक बीजेपी के पास थी, कांग्रेस के पास एक भी सीट नहीं थी।

पचपदरा से कांग्रेस विधायक रहे मदन प्रजापत ने बालोतरा को जिला बनाने की मांग पूरी नहीं होने तक जूतों का त्याग किया था।
पचपदरा से कांग्रेस विधायक रहे मदन प्रजापत ने बालोतरा को जिला बनाने की मांग पूरी नहीं होने तक जूतों का त्याग किया था।

बालोतरा : जिले के लिए नंगे पैर रहे मदन प्रजापत हारे, तीन में से दो सीट बीजेपी, एक कांग्रेस ने जीती बालोतरा को जिला बनाने की मांग को लेकर पचपदरा से कांग्रेस विधायक मदन प्रजापत नंगे पैर रहे थे, जब जिला बना तभी जूते पहने थे, मदन प्रजापत जिला बनने के बाद हार गए। 2023 में बालोतरा जिले की बायतु, पचपदरा और सिवाना में से केवल एक सीट पर कांग्रेस जीत पाई। दो सीट बीजेपी को मिली। जबकि 2018 में कांग्रेस के पास दो सीट थीं।

फलोदी : दोनों सीटों पर कांग्रेस हारी, खाता ही नहीं खुला फलौदी जिला बनाने के बाद 2023 में दोनों सीटें फलौदी और लोहावट से कांग्रेस हार गई। 2018 में लोहावट सीट कांग्रेस के पास थी। फलोदी सी बीजेपी जीती थी।

जोधपुर ग्रामीण : जिला बनाने का फायदा बीजेपी को, 4 पर जमाया कब्जा जोधपुर ग्रामीण को जिला बनाने का फायदा कांग्रेस को मिलने की बजाय बीजेपी को ज्यादा हुआ। यहां की पांच सीटों में से बीजेपी ने चार पर जीत हासिल की। कांग्रेस केवल भोपालगढ़ सीट ही जीत पाई। जबकि बीजेपी ने लूणी, बिलाड़ा, ओसियां, शेरगढ़ में जीत दर्ज की। 2018 में कांग्रेस ने चार और आरएलपी ने एक सीट जीती थी। बीजेपी का यहां ‘शून्य’ पर थी।

 

ब्यावर : जिला बनने के बाद भी नहीं खुला खाता, तीनों सीट हारी कांग्रेस ब्यावर को जिला बनाने के बाद 2023 के चुनाव में तीनों सीटों पर कांग्रेस को जीत की उम्मीद थी। लेकिन इसके उलट हुआ। तीनों सीटें ब्यावर, मसूदा और जैतारण पर बीजेपी जीती, कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। जबकि 2018 में कांग्रेस ने एक सीट मसूदा जीती थी।

गंगापुर सिटी : जिला बनने के बाद तीनों सीटों पर कांग्रेस जीती जिला बनाने के बाद हुए 2023 के चुनाव में कांग्रेस ने तीनों सीट गंगापुर, बामनवास और टोडाभीम जीती। बीजेपी यहां खाता नहीं खोल पाई। 2018 में कांग्रेस दो सीट जीती थी, गंगापुर निर्दलीय के पास थी।

शाहपुरा : दोनों सीटों पर बीजेपी जीती, कांग्रेस का खाता नहीं खुला कांग्रेस ने शाहपुरा जिला बनाया। यहां की जहाजपुर और शाहपुरा दोनों सीटों पर बीजेपी जीती। जिला बनाने का फायदा कांग्रेस को एक सीट पर भी नहीं मिला। 2018 में भी ये दोनों सीट बीजेपी के पास थी, जो 2023 में भी बरकरार रहीं।

डोटासरा के लिए जो अवसर, मदन राठौड़ के लिए वही चुनौती बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली को गहलोत सरकार ने संभाग का दर्जा दिया था, जिसे उनकी ही सरकार ने छीन लिया है। मदन राठौड़ का इलाका पाली अब संभाग मुख्यालय नहीं रहेगा। इसी तरह कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का गृह जिला सीकर से भी संभाग खत्म कर दिया है।

डोटासरा की मांग पर सीकर को गहलोत सरकार ने संभाग मुख्यालय बनाने का फैसला किया था। विधानसभा चुनाव में डोटासरा ने इसका क्रेडिट भी लिया था। अब बदले हुए सियासी हालात में डोटासरा के गृह जिले से बीजेपी सरकार ने संभाग का दर्जा छीनकर उन्हें नया मुद्दा थमा दिया है। डोटासरा ने कोर्ट जाने और आंदोलन करने का ऐलान कर इस मुद्दे पर सियासी दांव पेच इस्तेमाल करने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष में होने के कारण वे इसे एक सियासी अवसर के तौर पर भुनाएंगें।

इधर, खुद की सरकार होने के बावजूद पाली को संभाग मुख्यालय का दर्जा बरकरार नहीं रख पाने के कारण बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ को बड़ी चुनौतियों से गुजरना होगा। इस फैसले से उनके सियासी नरेटिव पर असर होगा। हालांकि राठौड़ के पास इस मुद्दे को हैंडल करने का एक ही तर्क है कि बिना मांग के ही पाली को संभाग बनाया गया था, सरकार ने बाकी जिले और संभाग भी खत्म किए हैं, लेकिन इस तर्क से जनता को मना पाना बड़ी चुनौती होगी।

बांसवाड़ा संभाग खत्म करने के बाद बीएपी भी आक्रामक होगी बांसवाड़ा संभाग खत्म करने से बीएपी के प्रभाव वाले इलाके में भी सियासी उफान आना तय मान जा रहा है। बांसवाड़ा-डूंगरपुर से बीएपी नेता राजकुमार रोत सांसद हैं। आदिवासी संभाग मुख्यालय हटाने को बीएपी और कांग्रेस दोनों मुद्दा बनाएगी। अगर यह मुद्दा बना तो आदिवासी क्षेत्र में पहले से चुनौतियों का सामना कर रही बीजेपी के लिए मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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