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सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज:सरकार आठ माह से नहीं कर रही स्थायी अधीक्षकों की नियुक्ति, SMS अधीक्षक डॉ. भाटी ने मांगा वीआरएस

सरकारी अस्पतालों के पदों से डॉक्टर्स का मोह भंग होता जा रहा है। अस्पतालों के अधीक्षक के लिए आवेदन नहीं करने वाले डॉक्टर्स में जहां कमी आई है, वहीं अब एसएमएस के कार्यवाहक अधीक्षक डॉ. सुशील भाटी ने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया है। उन्होंने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वीआरएस मांगा है। उन्होंने लिखा है कि अब पद पर नहीं रहना चाहता।

बता दें कि अप्रैल माह में एसएसबी अधीक्षक डॉ. विनय मल्होत्रा भी कह चुके हैं कि अब पद पर नहीं रहना चाहता। अन्य अस्पतालों के डॉक्टर्स भी अधीक्षक पद पर नहीं रहना चाहते और सरकार से लेकर सचिवालय के अधिकारियों तक को पद छोड़ने के लिए कह चुके हैं। इधर, सरकार पिछले आठ महीने में आठ स्थायी अधीक्षक नहीं बना पा रही है।

अधिकारियों का सख्त रवैया नहीं पचा पा रहे डॉक्टर्स

हालही में एसएमएस के सर्जरी विभाग में छत से मलबा गिरने के मामले में चिकित्सा शिक्षा विभाग के आला अधिकारी की ओर से एसएमएस अधीक्षक सहित अन्य डॉक्टर्स से काफी तल्खी से बात की गई थी। डॉक्टर्स ने यह बताया कि पूरे मामले में पीडब्ल्यूडी अधिकारियों की खामी है, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई और डॉक्टर्स पर भी कार्रवाई कर दी गई। इससे पहले पार्किंग मामले में और कैंटीन को बंद कर देने के मामले में भी डॉक्टर्स को सुनना पड़ा था।

डॉक्टर्स का कहना है कि अधिकारियों और छोटे जनप्रतिनिधियों द्वारा जिस तरह का व्यवहार अभी किया जा रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ। हर काम को नियमों के तहत ही किया जा सकता है और कोई भी काम के लिए एक व्यक्ति जिम्मेदारी नहीं हो सकता। सरकार और चिकित्सा विभाग को जिस काम या नियमों के लिए लिखा जाता है उसे पूरा नहीं किया जाता और कुछ दिन बाद पत्र लिखने वाले डॉक्टर को ही टारगेट किया जाता है।

  • पिछले वर्षों में डॉ. राजेश शर्मा, डॉ. जगदीश, डॉ. अचल, डॉ. राजीव, डॉ. राशिम, डॉ. महेन्द्र बैनाड़ा सहित अन्य पर कार्रवाई की गई।
  • अस्पताल में कोई भी घटना, मामला होने पर डॉक्टर्स को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। मीटिंग में अभद्र और तल्ख भाषा में बात की जाती है।
  • एसएमएस, जेके लोन, महिला, जनाना जैसे अस्पतालों में रोजाना दर्जनों ऐसे मरीज आते हैं, जिनके लिए विधायक, मंत्री, सीएमओ और आईएएस-आईपीएस के फोन आते हैं।
  • पार्किंग, कैंटीन जैसे छोटे कामों के लिए एप्रोच कॉल आते हैं और गड़बड़ी की जिम्मेदारी डॉक्टर्स पर थोपी जाती है।
  • काम की अधिकता बढ़ रही है और कोई भी काम छूट जाता है तो डॉक्टर्स पर गाज गिरती है।
  • अस्पताल में स्टाफ की बेहद कमी है और मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
  • छोटे मामले राजनीतिक तूल बन जाते हैं और कमेटियां बना दी जाती हैं।
Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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