पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस नेता प्रताप सिंह खाचरियावास ने केंद्र सरकार के बजट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट देश की जनता की उम्मीदों पर पानी फेरने वाला और पूरी तरह से विफल बजट है। बजट भाषण के दौरान ही शेयर बाजार का धड़ाम से गिरना इस बात का प्रमाण है कि यह बजट न तो देशहित में है और न ही आम आदमी के हित में।
खाचरियावास ने कहा कि जब कोई बजट देश को लाभ पहुंचाने वाला होता है तो बाजार में उत्साह दिखता है, लेकिन जब बजट उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने वाला और आम जनता को नुकसान देने वाला होता है, तब शेयर बाजार गिरता है। यह बजट आंकड़ों का मायाजाल मात्र है, जिसमें महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कोई ठोस समाधान नहीं है।
उन्होंने कहा कि पेट्रोल-डीजल के दाम कम नहीं किए गए, खाने-पीने की जरूरी वस्तुओं को सस्ता नहीं किया गया और रोजगार सृजन को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं है। देश का नौजवान बेरोजगारी से त्रस्त होकर आत्महत्या कर रहा है, लेकिन भाजपा सरकार को यह सच्चाई दिखाई नहीं दे रही है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार ने कैंसर की कुछ दवाइयों को सस्ता करने की घोषणा जरूर की है, लेकिन सवाल यह है कि इन दवाइयों को पूरी तरह मुफ्त क्यों नहीं किया गया? राजस्थान में कांग्रेस सरकार पहले से ही आम जनता को मुफ्त दवाइयां उपलब्ध करा रही है। केंद्र सरकार एहसान जताने की बजाय जनता के स्वास्थ्य की पूरी जिम्मेदारी ले।
खाचरियावास ने आरोप लगाया कि यह बजट देश के उद्योगपतियों के लिए तो फायदेमंद हो सकता है, लेकिन आम जनता के लिए नहीं। जीएसटी और विभिन्न एजेंसियों के अत्याचारों से व्यापारी वर्ग परेशान है। लाखों व्यापारी देश छोड़ने को मजबूर हो गए हैं क्योंकि सरकार किसी को भी सुरक्षित वातावरण (सेफ कॉरिडोर) नहीं दे रही है—न बेरोजगारों को, न कर्मचारियों को, न व्यापारियों को, न मजदूरों को और न ही किसानों को।
उन्होंने कहा कि इस बजट में गरीब, किसान, मजदूर, व्यापारी, कर्मचारी, नौजवान—सबके हाथ खाली हैं। भाजपा सरकार ने गरीब पर सबसे बड़ा वार किया है।
खाचरियावास ने जनता से अपील करते हुए कहा कि जो बजट गरीब, किसान, मजदूर, व्यापारी, कर्मचारी और नौजवान के लिए नहीं है, वह कभी देश का भला नहीं कर सकता। यदि भाजपा के घमंड को तोड़ना है तो जनता को उन्हें सबक सिखाना होगा।
अंत में उन्होंने कहा कि यह बजट पूरी तरह जीरो है और केंद्र की भाजपा सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। अब तो हालात ऐसे हैं कि केंद्र सरकार की संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है और उसकी आत्मा मर चुकी है।






