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पालीवाल ब्राह्मणों की समृद्धि का प्रतीक खाभा फोर्ट, अब जीर्णोद्धार शुरू होने के बाद मूर्तरूप ले रहा किला

जैसलमेर : जैसलमेर शहर से करीब 35 किमी दूर स्थित खाभा फोर्ट का सौंदर्य अब निखर उठा है. कुछ समय पहले तक खंडहर में तब्दील हो चुके इस प्राचीन दुर्ग का जैसलमेर विकास समिति की ओर से जीर्णोद्धार करवाया जा रहा है. खाभा फोर्ट व उसके पीछे स्थित 100 खंडहर मकानों का दृश्य अद्भुत है. यह उन्हीं 84 गांवों में से एक है जिन्हें पालीवाल ब्राह्मणों ने 18वीं शताब्दी ने एक ही रात में खाली कर दिया था. इनमें से कुलधरा व खाभा ऐसे गांव है जहां आज भी सैकड़ों मकान खंडहर के रूप में मौजूद है.

14वीं शताब्दी में बना खाभा फोर्ट पालीवाल ब्राह्मणों की समृद्धि का प्रतीक है. इतिहासकारों के अनुसार 14वीं शताब्दी में शहर के रूप में विकसित इस गांव को सिल्क रूट का चेक प्वांइट भी कहा जाता है. पाकिस्तान से भारत को जोड़ने वाले सिल्क रूट पर आने वाले सामान का टैक्स यहीं चुकाया जाता था. 1825 के लगभग पालीवाल ब्राह्मणों ने एक ही रात में 84 गांव खाली कर दिए थे. उसके बाद से किला जर्जर होता गया. अब इस किले में नेशनल जियोलॉजिकल म्यूजियम बनाया जा रहा है. खाभा फोर्ट पूरी तरह से जर्जर हो चुका था. तत्कालीन कलेक्टर रजत मिश्र व उसके बाद जिले में आए सभी कलेक्टर ने इस योजना को मूर्त रूप देने का प्रयास किया.

इसी वजह से 25 साल में इस किले ने मूर्त रूप ले लिया है. यहां फोर्ट के अलावा भी कई काम हुए पूरा हो चुका है. उनके अनुसार 1999 में यह फोर्ट पूरी तरह से खंडहर बन चुका था. इसके नक्शे की कल्पना करके धीरे धीरे इसे मूर्त रूप दिया जा रहा है.
अब इस किले प्राचीन शैली के अनुसार ही तैयार किया जा रहा है. शहर के कई प्राचीन घरों में आज भी नक्काशीदार झरोखे लगे हैं. जैसलमेर विकास समिति इसी प्रयास में है कि जैसलमेर शहर के प्राचीन घरों में लगे झरोखों को खरीदकर ही इस किले में लगाया जाए ताकि इसका पुरातन रूप ही नजर आए. दो मंजिला में बने इस किले के बीच में दो चौक है. जिसमें चारों तरफ झरोखे लगाए गए हैं. किले में प्रवेश करते ही जैसलमेर की अद्भुत स्थापत्य कला का अहसास हो जाता है

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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