केंद्र सरकार की ओर से कच्चे और परिष्कृत खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में 20 फीसदी तक बढ़ोतरी से तेल आधारित कपड़े धाेने का साबुन यानी लांड्री साेप 5 से 8 रुपए किलाे तक महंगे हाेने की आशंका है। दरअसल, पाम ऑयल का सह उत्पाद पाम फैटी तेल आधारित लांड्री साेप कंपनियों के लिए प्रमुख कच्चा माल है।
शुल्क वृद्धि के बाद इसकी कीमत 74-75 से बढ़कर 85-86 रुपए किलाे हाे गई। इसके मद्देनजर साबुन कंपनियां बढ़ी लागत का भार उपभाेक्ताओं पर डालने की तैयारी कर रही हैं। उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक प्रदेश के छाेटे उद्योग ही नहीं, देश की बड़ी कंपनियां भी मार्जिन बरकरार रखने के लिए साबुन की कीमत 1.6-2.5 फीसदी तक बढ़ाने की तैयारी में है।
राजस्थान साेप मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष जगदीश साेमानी का कहना है कि पाम फैटी की कीमत में 20 फीसदी तक बढ़ाेतरी से तेल आधारित लांड्री साेप उत्पादकों के लिए मार्जिन बनाए रखने के लिए कीमत बढ़ाना जरूरी हाे गया है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा एजेंसी नोमुरा के मुताबिक, जो कंपनियां घरेलू स्तर पर पाम फैटी एसिड डिस्टिलेट (पीएफएडी) खरीदती है, उनको मार्जिन बनाए रखने के लिए साबुन की कीमत में 1.6 फीसदी की वृद्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। पीएफएडी कच्चे माल की लागत का 12-13 फीसदी है।
भास्कर एक्सपर्ट; पॉम फैटी के दाम बढ़ना है कारण
ओसवाल साेप ग्रुप के एमडी अजय जैन के मुताबिक, खाद्य तेल पर आयात शुल्क में 20% वृद्धि से पाम फैटी और एसिड ऑयल की कीमत 8-9 फीसदी बढ़ गई है। राइस ब्रान ऑयल लगभग 20 फीसदी महंगा हाे गया है। साबुन के कच्चे माल में लगभग 40% एसिड आयल व 40% पाम फैटी हाेता है। इस कारण कपड़े धाेने का साबुन 5-8 रुपए किलाे तथा सोप नूडल्स में लगभग 20% और पाम स्टेरिंग में करीब 15% की तेजी से नहाने का साबुन 8-10 रुपए किलाे महंगा हाे सकता है।
फाइन ग्राे इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विष्णु भूत के मुताबिक, ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्राें में तेल आधारित कपड़े धाेने का साबुन बड़ी तादाद में उपयाेग हाेता है। प्रदेश में छाेटी-बड़ी करीब एक हजार इकाइयां इस तरह का साबुन बनाती है। शुल्क में बढ़ाेतरी के बाद साबुन उत्पादकों काे प्रति किलाे 2 से 2.5 रुपए किलाे का नुकसान हाे रहा है।






