साल 2004, मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकसभा का पहला सेशन। देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब नए प्रधानमंत्री को सदन में न तो अपने मंत्रियों के परिचय कराने की अनुमति दी गई और न ही उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का मौका मिला। तब मुख्य विपक्षी पार्टी BJP शिबू सोरेन और उन नेताओं के मंत्री बनाए जाने का विरोध कर रही थी, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
10 जून 2004, नई संसद के ओपनिंग सेशन का आखिरी दिन। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने PM मनमोहन सिंह को बोलने के लिए इनवाइट किया, लेकिन विपक्ष ने इसकी अनुमति नहीं दी। इससे डॉ. सिंह परेशान हो गए। उन्हें बेहद गुस्सा आया। उन्हें दुख हुआ कि विपक्षी दल BJP नए प्रधानमंत्री को सदन में बोलने नहीं दे रही। बाद में BJP न चाहते हुए भी प्रधानमंत्री के भाषण के लिए तैयार हो गई।
मनमोहन सिंह परेशान दिख रहे थे। वे खड़े हुए और दुखी मन से कहा- ‘अध्यक्ष महोदय, मुझे पता चला है कि दोनों पक्षों के राजनीतिक दलों के बीच इस बात पर सहमति है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को सीधे मतदान के लिए रखा जाए और सर्वसम्मति से पारित किया जाए। मैं इस अवसर पर लोकसभा के सभी सदस्यों को धन्यवाद देता हूं।’

मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइजर रहे संजय बारू अपनी किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ में लिखते हैं- ‘इस घटना के बाद मनमोहन सिंह उदास मन से घर लौटे। इसके बाद तय किया गया कि प्रधानमंत्री जो बयान सदन में देना चाहते थे, वो बयान टीवी के माध्यम से देश के नाम दिया जाएगा। मुझे और मणि दीक्षित को प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन को रीड्राफ्ट करने की जिम्मेदारी दी गई।
ड्राफ्ट तैयार करने के बाद, मैंने प्रधानमंत्री को सलाह दी कि वे टीवी पर भाषण देने से पहले टेलीप्रॉम्प्टर के सामने भाषण देने की प्रैक्टिस करें। प्रधानमंत्री इसके लिए राजी भी हो गए। 7 रेस कोर्स रोड यानी प्राइम मिनिस्टर आवास में एक टीवी कैमरा इंस्टॉल किया गया।
PM हर दिन दोपहर में लंच करने के बाद एक घंटा कैमरे के सामने भाषण देने की प्रैक्टिस करते थे। दिन का काम पूरा होने के बाद मैं उन्हें रिकॉर्डिंग सुनाता था और उनकी गलतियों के बारे में बताता था, ताकि वे सुधार कर सकें। उनकी आवाज बहुस सॉफ्ट थी। वे महत्वपूर्ण बात कहने के बाद, बिना पॉज लिए अगले वाक्य की तरफ बढ़ जाते थे।’
मनमोहन सिंह के पहली स्पीच को तैयार करने में तीन दिन लगे, टेलीप्रॉम्प्टर पर की थी प्रैक्टिस संजय बारू लिखते हैं- मनमोहन सिंह का पहले राष्ट्र के नाम टेलीविजन स्पीच की प्रैक्टिस में तीन दिन लगे थे। 24 जून की सुबह उनकी स्पीच रिकॉर्ड की गई और रात में उसे टेलीकास्ट किया गया। अगली सुबह ‘द हिंदू अखबार’ में लीड स्टोरी छपी। इसमें प्रधानमंत्री के भाषण की तारीफ की गई।
प्रधानमंत्री के भाषण के हिंदी वाले हिस्से को उर्दू में लिखा गया था, क्योंकि पश्चिमी पंजाब यानी अब के पाकिस्तान में जन्मे मनमोहन सिंह ने कभी हिंदी पढ़ना नहीं सीखा था। उनकी मातृभाषा पंजाबी थी, जबकि उर्दू उनके स्कूल एजुकेशन की लैंग्वेज थी।

मनमोहन सिंह को उर्दू अच्छी आती थी। उन्हें उर्दू साहित्य और कविताओं की भी अच्छी समझ थी। वे सदन में भी अक्सर उर्दू कविताओं का इस्तेमाल करते थे। उन्होंने सदन में एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशरफ के लिए कहा था- ‘ये जब्र भी देखा है, तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई’… मनमोहन सिंह की स्वतंत्रता दिवस की स्पीच हमेशा उर्दू में लिखी जाती थी।
मनमोहन सिंह के कान में जाकर कहना पड़ता था- ‘स्माइल’ संजय बारू लिखते हैं- ‘मनमोहन सिंह पब्लिक स्पीच के लिए खुद को तैयार करते रहते थे। उनके साथ यह कभी नैचुरली नहीं आया। कैमरा के सामने आने पर मुस्कुराना नेताओं की बेसिक जरूरत होती है, लेकिन ऐसा करना भी मनमोहन सिंह के लिए आसान नहीं रहा। मुझे अक्सर उनके कान में जाकर कहना पड़ता था ‘स्माइल’। SPG के जवान उनसे सटकर खड़े होते थे। कई बार ऐसा करते मुझे डर लगता था।
जब भी प्रधानमंत्री को किसी आतंकवादी हमले की निंदा के लिए टीवी पर आना होता, तो मैं उनसे आग्रह करता था कि वे पहले से तैयार स्क्रिप्ट न पढ़ें, बल्कि कैमरे के सामने आकर बोलें। समय के साथ उन्होंने टेलिप्रॉम्टर देखकर बोलना तो सीख लिया, लेकिन वे कभी बेहतर पब्लिक स्पीकर नहीं बन सके। न भीड़ के सामने, न टीवी पर।
जब भी उनका कोई टीवी इंटरव्यू या स्टेटमेंट प्रसारित होता, तो मैं उसका कैमरा एंगल डिसाइड करता था। अगर PM बोलने में कोई मिस्टेक करते तो मैं फिर से रिकॉर्डिंग के लिए कहता था। मैं यह तय करता था कि अप्रूव्ड वर्जन ही प्रसारित हो सके।’

जब मनमोहन सिंह ने कहा- ‘क्या शेर कभी अपने दांत साफ करता है’ संजय बारू लिखते हैं- ‘मनमोहन सिंह को US कांग्रेस में भाषण देना था। मुझे पता था कि PM को दिक्कत कहां आती है। इसलिए मैं उन शब्दों को अंडरलाइन करते जा रहा था, जो अहम होते थे। जिन शब्दों पर ऑडियंस वाहवाह करती, ताकि PM समझ सकें कि कहां पर उन्हें पॉज लेना है। हालांकि, वे शायद ही ऐसा करने में कामयाब रहे।’
‘जुलाई 2004, PM मनमोहन सिंह का बैंकॉक में मीडिया से पहला इंटरैक्शन था। मैं उनके कमरे में गया और कहा कि क्या मीडिया को फेस करने के लिए पहले तैयारी की जरूरत है? उन्होंने जबाव दिया- ‘क्या शेर कभी अपने दांत साफ करता है।’

मनमोहन सिंह के पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण पर सोनिया गांधी की कुर्सी आनन-फानन में बदलनी पड़ी थी संजय बारू अपनी किताब द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में लिखते हैं- ‘15 अगस्त, 2004 की बात है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लाल किले की प्राचीर से संबोधित करना था। प्रधानमंत्री के SPG ने मुझसे कहा कि मैं भाषण से एक दिन पहले ड्रेस रिहर्सल कार्यक्रम में भाग लूं। मैं लाल किला पहुंचा। लाल किले की प्राचीर के चारों तरफ घूमते हुए मैंने अचानक ‘सिटिंग अरेंजमेंट’ पर नजर दौड़ाई।
पहली लाइन में पहली सीट मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरन कौर की थी। उसके बाद वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी थी। मैं हैरान था कि पहली पंक्ति में सोनिया गांधी की कुर्सी नहीं थी।’
संजय बारू लिखते हैं- ‘मैंने रक्षा मंत्रालय के अधिकारी से पूछा कि सोनिया को कहां बैठाया जाएगा, तो उन्होंने चौथी या पांचवी पंक्ति की तरफ इशारा किया, जहां उनकी बगल में नजमा हेपतुल्लाह को बैठाया जाना था। मैं यह सुनकर अवाक रह गया। मुजे ध्यान आया कि सोनिया गांधी राष्ट्रपति भवन में होने वाले कार्यक्रमों में अक्सर सामने बैठती हैं। अगर सोनिया गांधी को पहली पंक्ति में जगह नहीं मिली तो मनमोहन सिंह को व्यक्तिगत तौर पर बहुत शर्मिंदगी होगी और सोनिया गांधी भी अपमानित महसूस करेंगी। इसके बाद मैंने PMO के एक अधिकारी को फोन किया और समय रहते सोनिया की चेयर बदल गई।’

जब मनमोहन से मिलने पाकिस्तान से दिल्ली आया उनके बचपन का दोस्त मनमोहन सिंह का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। बंटवारे के बाद मनमोहन सिंह का परिवार भारत आ गया। बंटवारे के वक्त मनमोहन सिंह 15 साल के थे। पाकिस्तान में राजा मोहम्मद अली उनके खास दोस्त थे। अली, मनमोहन सिंह को ‘मोहना’ कहकर बुलाते थे।
2004 में जब मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने, तो मोहम्मद अली को खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने प्रधानमंत्री से मिलने की इक्षा जताई। चार साल बाद यानी 2008 में मनमोहन सिंह ने अली को दिल्ली आने का न्योता दिया।
मई 2008, मोहम्मद अली अपने परिवार के साथ दिल्ली पहुंचे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले। अली अपने साथ मनमोहन सिंह के पैतृक गांव की मिट्टी और पानी लेकर आए थे। जाते वक्त मनमोहन सिंह ने अली को शॉल और टाइटन की घड़ी दी थी।

दफ्तर जाने से पहले दसवें सिख गुरु का अपना पसंदीदा शबद गुनगुनाया करते थे मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरन कौर ने मशहूर अर्थशास्त्री ईशर अहलूवालिया को बताया था- ‘मनमोहन सिंह जब दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे होते थे, तो दसवें सिख गुरु का अपना पसंदीदा शबद गुनगुनाया करते थे….
देह शिवा बर मोहे, सुभ करमन ते कबहूं न टरों
न डरों अरि सों जब जाए लरों, निसचै करि अपनी जीत करौं।”
मशहूर अर्थशास्त्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया अपनी आत्मकथा ‘बैकस्टेज द स्टोरी बिहाइंड इंडियाज ग्रोथ इयर्स’ में लिखते हैं- मनमोहन सिंह के लिए धर्म निहायत ही निजी विषय भले ही हो, लेकिन उनके शरीफ व्यक्तित्व के पीछे एक सिख शख्स मौजूद है, जो अपनी सारी ताकत गुरबानी से लेता है।






