भारत-पाकिस्तान तनाव और फिर सीजफायर के बाद फिर से पुराने युद्धों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। पाकिस्तान सभी युद्ध बुरी तरह हारा।
1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। पूर्वी पाकिस्तान को अलग देश बांग्लादेश बना दिया। पाकिस्तान के दो टुकड़े करने में राजस्थान के फौजी अफसर लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह का भी बड़ा योगदान रहा है।
सगत सिंह असम के तेजपुर में 4 कोर के जनरल कमांडिंग अफसर थे। सगत सिंह को 1971 के युद्ध में दिखाए कौशल पर पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
सगत सिंह ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पाकिस्तानी फौज के सरेंडर के बाद जनरल नियाजी और कुछ सीनियर आर्मी अफसर कई दिनों तक रोया करते थे।
सरेंडर के बाद कई ऐसे मौके आए जब सगत सिंह ने जनरल नियाजी और सीनियर पाकिस्तानी अफसरों से बात की। पाकिस्तानी अफसर कहा करते थे कि वे अपने देश में मुंह दिखाने योग्य नहीं रहेंगे। आगे पढ़िए सगत सिंह की कहानी…

सगत सिंह ने छह युद्ध लड़े, पाकिस्तान के क्वेटा में ट्रेनिंग की
लेफ्टिनेंट जनरल रणधीर सिंह ने अपनी किताब ‘ए टैलेंट फोर वॉर, द मिलिट्री बायोग्राफी ऑफ लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह’ में लिखा है कि सगत सिंह आजादी से पहले बीकानेर रियासत की सेना गंगा रिसाला में भर्ती हुए थे।
गंगा रिसाला में अफसर बने। सेकेंड वर्ल्ड वॉर के दौरान बीकानेर की सेना अंग्रेजों की तरफ से लड़ने गई थी। संगत सिंह उस दौरान इराक के मोर्चे पर लड़ने के लिए गए।
स्टाफ कॉलेज क्वेटा में ट्रेनिंग के लिए उन्हें चुना गया। आजादी के बाद क्वेटा पाकिस्तान में चला गया। देश की आजादी के बाद बीकानेर की सेना का भारतीय सेना में विलय हो गया।
सगत सिंह बीकानेर सेना में अफसर थे, उनकी सीनियॉरिटी भारतीय सेना में भी बरकरार रखी गई। सगत सिंह ने छह युद्ध लड़े। सब में जीत दर्ज की।

बांग्लादेश युद्ध के दौरान पहले ही तैयार कर ली थी रणनीति
लेफ्टिनेंट जनरल रणधीर सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि फ्लेक्सिब्लिटी युद्ध का सिद्धांत है। एक अच्छा कमांडर हमेशा संभावनाओं की तलाश करता है, जो लड़ाई के दौरान आ सकती हैं।
सगत सिंह एक ऐसे कमांडर थे। जो संभावनाओं के दोहन में बाज की सी आंख रखते थे। बांग्लादेश युद्ध के दौरान शुरुआत में उनकी यूनिट को ढाका में ऑपरेशन करने का कोई टास्क नहीं दिया था, लेकिन सगत सिंह ने पहले से ही इसकी तैयारी की।
ढाका को जीतने की एडवांस रणनीति बनाई। सगत सिंह की यही रणनीति आगे काम आई।

पहला हेलिबॉर्न ऑपरेशन करके युद्ध का रुख बदल दिया
पाकिस्तानी फौज ने मेघना नदी के पुल को उड़ा दिया था, यह सबसे चौड़ी नदी थी। सगत सिंह ने बांग्लादेश युद्ध की रणनीति तैयार की। पहला हेलिबॉर्न ऑपरेशन किया।
यह भारतीय सेना द्वारा किया जाने वाला पहला ऑपरेशन था। इस पूरे ऑपरेशन के दौरान संगत सिंह ने लगातार फ्लाइंग करके अपनी टीम का मनोबल ऊंचा रखा।
एक बार फ्लाइंग के दौरान उनके हेलिकॉप्टर पर पाकिस्तानी फौज ने गोलाबारी की, उनके हेलिकॉप्टर पर कई गोलियां लगीं। उन्होंने एक कमांडर के तौर पर पूरे ऑपरेशन के दौरान उड़ान भरकर लगातार अपने टीम का मनोबल बनाए रखा।
जब हेलिकॉप्टर पर मशीन गन से फायरिंग हुई तो एक गोली उनके सिर के पास से निकल गई थी, लेकिन वह बच गए।

संगत सिंह के प्लान से सीनियर्स सहमत नहीं थे
1971 में जब सगत सिंह की यूनिट आगे बढ़ रही थी। तब ढाका पर ऑपरेशन को लेकर उनके सीनियर्स से मतभेद थे। मेघना नदी को क्रॉस करके आगे बढ़ने पर सीनियर्स ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन सगत सिंह की तैयारी पूरी थी।
तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन सगत सिंह नहीं माने। उन्होंने ढाका के लिए ऑपरेशन करने के लिए मेघना नदी को क्रॉस किया। जो विश्व की सबसे चौड़ी नदी थी।
उन्होंने अपने सीनियर से स्पष्ट शब्दों में कहा- उनको जो टास्क दिया गया है, वह पूरा कर रहे हैं, जबकि वो तो उससे एक कदम आगे का टास्क पूरा कर रहे हैं।
सगत सिंह जगजीत सिंह अरोड़ा की बात से असहमति जताते हुए ऑपरेशन जारी रखने पर अड़े रहे। सगत सिंह का यही कदम भारतीय सेना को पूर्वी पाकिस्तान में जितवाने में अहम कदम साबित हुआ।
पाकिस्तानी सेना के सरेंडर में सगत सिंह साक्षी थे
बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह ढाका में पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करवाने वाले बड़े अफसरों में प्रमुख थे। जो पाकिस्तानी जनरल नियाजी के सरेंडर करने के दौरान मौजूद रहे।

सगत सिंह ने नाथूला में चीन को हराया
साल 1967 में सिक्किम के पास नाथू ला में सीमा पर चीन से तनाव हो गया था। जनरल सगत सिंह यूनिट को हेड कर रहे थे। सीमा पर तनाव हो रहा था, दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया था।
मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब ‘लीडरशिप इन द इंडियन आर्मी’ में नाथूला की लड़ाई पर लिखा है। किताब में लिखा है कि चीन ने सिक्किम की सीमा पर नाथू ला और जेलेप ला की सीमा चौकियों को खाली करने का अल्टीमेटम दिया था।
तब सेना के कोर मुख्यालय के प्रमुख जनरल बेवूर ने सगत सिंह को चौकियों को खाली करने का आदेश दिया। लेकिन वे तैयार नहीं हुए। नाथू ला हाइट पर है।
वहां से चीन पर निगरानी रखी जा सकती थी। सगत सिंह ने चीनी सैनिकों को तोपों से जवाब देना शुरू कर दिया। तीन दिन तक चले युद्ध में 300 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए थे।






