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जेल से कैदी की चिट्‌ठी को हाईकोर्ट ने माना याचिका:गरीब कैदियों के लिए पैरोल पर नई गाइडलाइन; अब आर्थिक स्थिति देखकर तय होगा बॉन्ड

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक कैदी की चिट्ठी को रिट याचिका मानते हुए अहम फैसला सुनाया है। जोधपुर मुख्यपीठ ने स्पष्ट किया कि गरीबी कोई गुनाह नहीं है। कोर्ट ने पैरोल पर रिहाई के लिए गरीब कैदियों से जमानती मांगने के अधिकारियों के यांत्रिक रवैये (मशीनी रवैया या मशीन की तरह व्यवहार करना) पर कड़ी नाराजगी जताई है।

जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की खंडपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में भविष्य के लिए नई गाइडलाइन जारी करते हुए कहा- कैदी की आर्थिक स्थिति देखकर ही बॉन्ड की शर्त तय की जाए।

यह मामला सेंट्रल जेल जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी खरताराम से जुड़ा है। कोर्ट ने उसकी चिट्ठी को ही रिट याचिका मानते हुए यह फैसला सुनाया है। इसमें न सिर्फ खरताराम को राहत दी, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए 6 सूत्रीय गाइडलाइन भी जारी की है। 6 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रख लिया था। 6 जनवरी 2026 को कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया।

हत्या के मामले में 2014 से काट रहा उम्रकैद पाली जिले का रहने वाला खरताराम हत्या के मामले में साल 2014 से सजा काट रहा है। 29 सितंबर 2025 को जिला पैरोल कमेटी ने उसे चौथी बार 40 दिन के नियमित पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया। लेकिन, कमेटी ने रिहाई के लिए 25-25 हजार रुपए के दो जमानती पेश करने की शर्त लगा दी।

आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और गरीब होने के कारण खरताराम यह शर्त पूरी नहीं कर सका। वकील करने के पैसे नहीं थे, इसलिए उसने जेल से ही पोस्टकार्ड भेजकर हाईकोर्ट से गुहार लगाई।

चौथी बार कोर्ट की शरण में कैदी कोर्ट ने पाया कि यह चौथा मौका है, जब इस कैदी को सिर्फ जमानती न दे पाने की वजह से हाईकोर्ट आना पड़ा है। इससे पहले साल 2019, 2020 और 2022 में भी उसे पैरोल मिला था, लेकिन तब भी अधिकारियों ने जमानती की शर्त लगा दी थी। उन तीनों मौकों पर हाईकोर्ट ने शर्त हटाकर उसे निजी मुचलके (Personal Bond) पर रिहा किया था। इसके बावजूद, अधिकारियों ने चौथी बार फिर वही शर्त थोप दी।

सिस्टम की उदासीनता पर कोर्ट नाराज कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा- यह एक परेशान करने वाला पैटर्न है। कैदी को अपनी गरीबी के कारण चौथी बार कोर्ट आना पड़ा है। यह अधिकारियों की संस्थागत उदासीनता (सिस्टम की बेपरवाही) को दर्शाता है। पैरोल एक सुधारात्मक अधिकार है, इसे अमीर और गरीब के बीच भेदभाव का जरिया नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा- अगर कोई कैदी गरीब है और जमानती नहीं ला सकता, तो उससे जमानती मांगना उसे पैरोल देने से मना करने जैसा ही है। पैरोल केवल पैसे वालों का विशेषाधिकार नहीं हो सकता।

फैसला: निजी मुचलके पर रिहाई कोर्ट ने खरताराम की याचिका स्वीकार करते हुए जिला पैरोल कमेटी के आदेश (25-25 हजार के 2 जमानती की शर्त) को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर पैरोल पर रिहा किया जाए।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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