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राजस्थान की आर्द्रभूमियाँ: पारंपरिक ज्ञान, समुदाय और संरक्षण

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 की थीम “आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाना” यह स्पष्ट करती है कि आर्द्रभूमियाँ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी प्रणालियाँ हैं। जल-अभाव से जूझते राजस्थान में आर्द्रभूमियों का संरक्षण सदियों से स्थानीय ज्ञान, परंपराओं और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से होता रहा है, जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखा है।

आर्द्रभूमियाँ वे क्षेत्र हैं जहाँ वर्ष भर या मौसमी रूप से जल का संचय होता है, जैसे झीलें, तालाब, दलदली क्षेत्र और पक्षी आवास। ये वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। राजस्थान की तालाब, नाड़ी, जोहड़ और झील जैसी पारंपरिक जल संरचनाएँ इसी पीढ़ीगत ज्ञान का सजीव उदाहरण हैं।

आर्द्रभूमियों के लाभ बहुआयामी हैं। ये जल सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं, कृषि और पशुपालन को सहारा देती हैं, प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराती हैं तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक होती हैं। पर्यटन और आजीविका के अवसरों के माध्यम से ये स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करती हैं। खिचन और मेनार जैसे स्थल यह प्रमाणित करते हैं कि जब समुदाय सांस्कृतिक रूप से आर्द्रभूमियों से जुड़ा होता है, तो संरक्षण अधिक प्रभावी और स्थायी बनता है।

इसके बावजूद, अतिक्रमण, अवैज्ञानिक विकास, अत्यधिक जल दोहन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण कई आर्द्रभूमियाँ दबाव में हैं। साथ ही पारंपरिक ज्ञान का क्षरण और नई पीढ़ी की इन प्रणालियों से दूरी संरक्षण के प्रयासों को और चुनौतीपूर्ण बनाती है।

इन चुनौतियों के समाधान हेतु राजस्थान सरकार द्वारा आर्द्रभूमियों की पहचान, सीमांकन और संरक्षण के लिए नीतिगत प्रयास किए गए हैं, जिनका प्रतिफल रामसर स्थलों की संख्या में वृद्धि के रूप में दिखाई देता है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर, जो 1981 में रामसर स्थल घोषित हुआ, राजस्थान का पहला रामसर स्थल है और यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल है। सांभर झील, जयपुर और नागौर जिलों की सीमा पर स्थित, 1990 में रामसर स्थल बनी और भारत की प्रमुख खारे पानी की झीलों में से एक है।

जून 2025 में उदयपुर जिले का मेनार पक्षी गाँव और फलोदी जिले का खिचन वेटलैंड रामसर स्थल घोषित किए गए, जहाँ सामुदायिक संरक्षण और स्थानीय परंपराएँ विशेष भूमिका निभाती हैं। इसके अतिरिक्त अलवर जिले की सिलीसेढ़ झील को दिसंबर 2025 में राजस्थान के पाँचवें रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिली। वर्तमान में भारत में कुल 96 रामसर स्थल हैं, जिनमें राजस्थान की भागीदारी निरंतर बढ़ रही है।

इन उपलब्धियों के साथ राजस्थान में तालछापर अभयारण्य, आना सागर झील, नक्की झील और पचपदरा झील जैसे अन्य स्थल भी अपनी पारिस्थितिक महत्ता के कारण भविष्य में रामसर मानकों के अनुरूप विकसित किए जाने की संभावनाएँ रखते हैं। इन स्थलों का वैज्ञानिक मूल्यांकन और समुदाय आधारित प्रबंधन उन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में अग्रसर कर सकता है।

समग्र रूप से मेनार, खिचन और सिलीसेढ़ जैसे स्थल यह दर्शाते हैं कि पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक सहभागिता के समन्वय से आर्द्रभूमि संरक्षण का एक प्रभावी और दीर्घकालिक मॉडल विकसित किया जा सकता है। नीति, विज्ञान और समुदाय के संयुक्त प्रयासों से आर्द्रभूमियाँ न केवल पर्यावरण संरक्षण का आधार बनेंगी, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को भी सुदृढ़ करेंगी।

 

– उमा व्यास (आरएएस)
लेखिका विभिन्न समसामयिक मुद्दों की जानकार एवं श्री कल्पतरू संस्थान की सक्रिय कार्यकर्त्ता है!

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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