उदयपुर इन दिनों केवल पर्यटकों की वजह से नहीं, बल्कि देशभर से आए उन जांबाजों की वजह से चर्चा में है जो आग की लपटों से खेलकर जिंदगियां बचाते हैं। यहां खेलगांव और गांधी ग्राउंड में आयोजित ऑल इंडिया फायर सर्विस स्पोट्र्स मीट में देशभर के 1547 फायर फाइटर्स अपनी वीरता, फुर्ती और अनुशासन दिखा रहे हैं।
देश में पहली बार फायर स्किल्स से जुड़ी ऐसी स्पेशल एक्टिविटी हो रही है, जो 2029 में गुजरात में होने वाले वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स के लिए भारत की ताकत को दुनिया को दिखाएगी। इस पांच दिवसीय स्पोर्ट्स मीट का शनिवार (31 जनवरी) को समापन होगा।
दैनिक भास्कर की टीम भी मैदान पर कवरेज के लिए पहुंची, जहां फायर फाइटर्स आग जैसी आपातकालीन घटनाओं से निपटने के लिए पसीना बहा रहे थे। सर्द हवाओं के बीच भी ये जांबाज खेल के बहाने अपनी क्षमता बढ़ाने में जुटे थे। यह मुकाबला केवल ताकत का नहीं, बल्कि समय, संतुलन और धैर्य की परीक्षा का था।
इस स्पोट्र्स मीट को तीन चरणों में बांटा गया। पहले चरण में भारी ‘फायर होज’ (पाइप) को तेजी से लपेटकर सेट करना था। दूसरे में पानी से भरे केन लेकर संकरी टनल पार करना, फिर 80 किलो वजनी डमी को सुरक्षित निकालना और अंत में सीढ़ियों से ‘मिशन टॉप’ तक पहुंचना था।
भास्कर टीम ने मैदान में उन योद्धाओं के असली संघर्ष और भारी किट के पीछे छुपे दर्द को महसूस किया और मैदान में उतरने का फैसला किया।

20 किलो का सुरक्षा घेरा, सांसों का संकट ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर सबसे पहले भास्कर रिपोर्टर सतीश शर्मा ने फायर फाइटर का वह विशेष सूट पहना, जिसे पहनना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। भारी सुरक्षा सूट, हेलमेट और कमर पर करीब 17 किलो वजनी ऑक्सीजन सिलेंडर। इसे पहनते ही शरीर का वजन अचानक 20 किलो बढ़ गया।
जो वर्दी दूर से आकर्षक लगती है, वह असल में इन जवानों के लिए एक चलता-फिरता किला है, जिसे ढोते हुए उन्हें दौड़ना और जान बचानी होती है। इस भारी किट के साथ पहला कदम बढ़ाते ही एहसास हो गया कि अगले कुछ मिनट शारीरिक और मानसिक क्षमता की अंतिम परीक्षा होने वाली है।
भारी पाइप के साथ दौड़ प्रतियोगिता का पहला पड़ाव फायर रेस्क्यू चैलेंज था। रिपोर्टर की पहली परीक्षा भारी फायर होज (पानी का मोटा पाइप) को कंधे पर उठाकर तय समय में दौड़ने की थी। यह पाइप देखने में सीधा लगता है, लेकिन कंधे पर आते ही यह असंतुलित और भारी हो जाता है। पसीने से भीगते हुए रिपोर्टर ने इसे उठाकर दौड़ने की कोशिश की और फिर उसे लपेटना शुरू किया। जरा सी चूक पाइप को उलझा सकती थी। असल हादसे में ऐसी देरी किसी की जान पर भारी पड़ सकती है।

80 किलो की डमी और संकरी टनल प्रैक्टिस का सबसे कठिन हिस्सा था ‘रेस्क्यू ऑपरेशन’। रिपोर्टर को 80 किलो वजनी डमी (घायल व्यक्ति का प्रतीक) को कंधे पर लादकर सुरक्षित जगह पहुंचाना था। 20 किलो के खुद के किट और ऊपर से 80 किलो की डमी के साथ संकरी सुरंग (टनल) में प्रवेश करना किसी बुरे सपने जैसा था।
अंधेरी और छोटी टनल में फंसे व्यक्ति को बाहर निकालना कितना जानलेवा हो सकता है, यह खुद रिपोर्टर ने डमी को घसीटते हुए महसूस किया। सांसें फूल रही थी और दिल की धड़कनें तेज थीं, लेकिन बगल में खड़े फायर फाइटर्स इसी काम को पलक झपकते ही कर रहे थे।
ऊंचाई का खौफ और मिशन टॉप अगला पड़ाव था ऊंची दीवार फांदना और ‘लैडर ड्रिल’ के जरिए ऊंचाई पर पहुंचना। भारी पाइप लाइन को थामकर लोहे की सीढ़ियों के सहारे चढ़ना संतुलन का सबसे बड़ा टेस्ट था। ऊंचाई पर जाकर हाइड्रेंट तकनीक का सटीक प्रदर्शन करना था। पसीने से पूरा सूट अंदर से भीग चुका था और हाथों की पकड़ ढीली पड़ रही थी, लेकिन जैसे-तैसे मिशन पूरा किया।
जब रिपोर्टर ने घंटों की मशक्कत के बाद उस भारी किट को उतारा, तो शरीर पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन उस थकान के बीच एक गहरी संतुष्टि थी कि उन अग्नि योद्धाओं के जीवन को करीब से समझा।
उदयपुर के नगर निगम के चीफ फायर ऑफिसर बाबूलाल चौधरी ने बताया- इसका मुख्य उद्देश्य फायर फाइटर्स को मानसिक और शारीरिक रूप से अभेद्य बनाना है।

टारगेट 2029 की तैयारी उदयपुर में हो रहा यह आयोजन केवल एक मेडल के लिए नहीं है। भारत साल 2029 में गुजरात में ‘वर्ल्ड पुलिस एंड फायर गेम्स’ की मेजबानी करने जा रहा है। अब तक हमारे जवान व्यक्तिगत तौर पर अंतरराष्ट्रीय खेलों में जाते थे, लेकिन अब उदयपुर में इस मीट के जरिए एक मजबूत राष्ट्रीय टीम तैयार हो रही है।
एयरपोर्ट अथॉरिटी, डीआरडीओ और विभिन्न राज्यों से आए 1547 जवान (फायर फाइटर्स) अब खुद को तराश रहे हैं, ताकि वे किसी भी कंडीशन में बेस्ट प्रैक्टिस और फुर्ती से किसी की जिंदगी बचा सकें।






