जयपुर। राजस्थान में मंदिर एवं माफी भूमि से जुड़े पुराने राजस्व रिकॉर्ड एक बार फिर कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। सामने आए दस्तावेजों के अनुसार ग्राम नाहरगढ़ की कुछ भूमि के रिकॉर्ड में मंदिर श्री कल्याणजी के नाम दर्ज खसरों के साथ-साथ होटल कंपनी ईआईएच एसोसिएटेड होटल्स लिमिटेड से संबंधित लीज प्रविष्टि का उल्लेख दिखाई देता है। दस्तावेजों में 20 वर्ष की लीज अवधि का उल्लेख भी सामने आता है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया की वैधानिकता और भूमि के वास्तविक स्वरूप का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच एवं मूल राजस्व रिकॉर्ड के परीक्षण से ही हो सकता है।
1.4165 हेक्टेयर भूमि की लीज ने उठाया सवाल
उपलब्ध जमाबंदी रिकॉर्ड में खसरा नंबर 102, 103, 104, 105, 111, 112, 113, 114 और 115 का कुल रकबा लगभग 1.4165 हेक्टेयर बताया गया है। इसी रिकॉर्ड से जुड़ी प्रविष्टियों में होटल कंपनी के पक्ष में लीज का उल्लेख दिखाई देता है।
वहीं दूसरी ओर इसी क्षेत्र के रिकॉर्ड में मंदिर श्री कल्याणजी के नाम खसरा नंबर 100, 101, 106, 107, 109 और 110 दर्ज दिखाई देते हैं, जिनका कुल रकबा लगभग 0.6071 हेक्टेयर बताया गया है।
इन दोनों रिकॉर्डों को सामने रखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि मंदिर की मूल भूमि कितनी थी, कौन-कौन से खसरे किस प्रक्रिया के तहत अलग हुए और भूमि होटल की लीज तक किस कानूनी प्रक्रिया से पहुंची?
पटवारी की रिपोर्ट से शुरू होती है पड़ताल
राजस्व व्यवस्था में मौके की स्थिति और भूमि संबंधी प्राथमिक जानकारी जुटाने में पटवारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि संबंधित भूमि को लेकर पटवारी स्तर पर क्या रिपोर्ट तैयार की गई थी? क्या पुराने राजस्व रिकॉर्ड, माफीदार कॉलम और भूमि की प्रकृति की जांच की गई थी? यदि जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट क्या कहती है?
तहसीलदार की फाइल में क्या है?
इसके बाद सवाल तहसील प्रशासन की भूमिका पर आता है। नामांतरण, जमाबंदी और भूमि की प्रकृति से जुड़े मामलों में तहसील स्तर पर उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं।
क्या संबंधित अधिकारियों ने मिसल बंदोबस्त, जागीर रजिस्टर, माफीदार कॉलम और पुरानी जमाबंदियों का परीक्षण किया? यदि होटल की लीज से पहले भूमि की कानूनी स्थिति की जांच हुई थी, तो उस जांच और आदेश की प्रति सार्वजनिक होना इस मामले में स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
कलेक्टर की निगरानी पर भी सवाल
मामला जिला प्रशासन की भूमिका तक भी पहुंचता है। यदि भूमि का संबंध मंदिर अथवा सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति से रहा है, तो उसके वर्तमान रिकॉर्ड, लीज आदेश और भूमि उपयोग से संबंधित दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन ने मंदिर से संबंधित भूमि के पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड का मिलान कराया? क्या लीज की प्रक्रिया और संबंधित अनुमतियों की समीक्षा हुई?
राजारामपुरा में जमीन के इतिहास ने बढ़ाई उलझन
मामले का दूसरा पहलू ग्राम राजारामपुरा, तहसील रामपुरा डाबड़ी से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध दस्तावेजों एवं संबंधित पक्ष के दावे के अनुसार पुराने रिकॉर्ड में भैरूनारायण पुत्र गोपीनाथ का खुदकास्त दर्ज था, जबकि माफीदार कॉलम में श्री ठाकुरजी का उल्लेख बताया गया है।
जागीर रिज्यूम के बाद भूमि के अधिकारों, मुआवजे और बाद में खातेदारी दर्ज होने की प्रक्रिया का भी उल्लेख सामने आता है। इसके बाद भूमि के विक्रय और नामांतरण की प्रक्रिया बताई गई है। बाद के रिकॉर्ड में इसी भूमि को माफी मंदिर की भूमि बताए जाने को लेकर विवाद खड़ा होने का दावा किया जा रहा है।यहां भी निर्णायक सवाल यही है कि मूल जागीर रजिस्टर, मिसल बंदोबस्त, माफीदार कॉलम और जागीर रिज्यूम रिकॉर्ड वास्तव में क्या कहते हैं?
मंदिर की जमीन या निजी खातेदारी? फैसला रिकॉर्ड से होगा
पूरे मामले में अलग-अलग पक्षों के दावे सामने आ रहे हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति अथवा अधिकारी को दोषी ठहराने के बजाय मूल दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
जांच में जागीरदार रजिस्टर, माफीदार कॉलम, मिसल बंदोबस्त, पुरानी जमाबंदियां, जागीर रिज्यूम रिकॉर्ड, मुआवजा आदेश, खातेदारी अधिकार, नामांतरण, वर्तमान जमाबंदी, होटल लीज दस्तावेज, भूमि उपयोग परिवर्तन तथा संबंधित विभागों की अनुमतियों की पड़ताल से स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है।
सबसे बड़ा सवाल—फाइल में क्या है?
मंदिर की भूमि यदि नियमानुसार लीज पर दी गई है तो संबंधित लीज आदेश, अनुमति और जांच रिपोर्ट सामने आनी चाहिए। वहीं यदि रिकॉर्ड में किसी स्तर पर विसंगति है तो उसकी जिम्मेदारी भी निष्पक्ष जांच के बाद तय होनी चाहिए।
सवाल किसी एक व्यक्ति पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड की सच्चाई सामने लाने का है।
बॉक्स आइटम | जांच के प्रमुख सवाल
मंदिर श्री कल्याणजी के नाम मूल भूमि कितनी थी?
1.4165 हेक्टेयर भूमि होटल की लीज तक कैसे पहुंची?
लीज किस सक्षम प्राधिकारी के आदेश से हुई?
पटवारी की रिपोर्ट में क्या दर्ज था?
तहसीलदार स्तर पर कौन-सी जांच हुई?
देवस्थान/सक्षम विभाग की अनुमति ली गई या नहीं?
वर्तमान में मंदिर के नाम कितनी भूमि दर्ज है?
राजारामपुरा की भूमि के मूल रिकॉर्ड क्या कहते हैं?
जागीर रिज्यूम के बाद खातेदारी अधिकार किस आधार पर मिले?
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कब होगी?
Author: newsinrajasthan
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