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बीहड़ से मुख्यधारा तक: चंबल का बदलता चेहरा और युवाओं के लिए संदेश

साहिर लुधियानवी का यह शेर जीवन को एक नैतिक लेखा-जोखा मानता है—जहाँ व्यक्ति अपने अनुभवों, संघर्षों और परिस्थितियों से जो कुछ पाता है, वही समाज को लौटाता है। लेकिन चंबल की कहानी इसके विपरीत है, जहाँ इतिहास ने हिंसा दी, पर वर्तमान उसे आत्मचिंतन,सुधार और पुनर्निर्माण में बदलने की कोशिश कर रहा है।

चंबल घाटी को लंबे समय तक भय, बीहड़ और दस्युता के प्रतीक के रूप में देखा गया। पर आज हमें चंबल की कहानी यह सिखाती है कि दस्यूता सामाजिक विफलता का दर्पण है जहाँ असमानता, शिक्षा की कमी और न्याय तक सीमित पहुँच ने पीढ़ियों को हाशिए पर धकेला। ऐसे में बीहड़ केवल क्षेत्र ना होके व्यवस्था की अनुपस्थिति का परिचायक बन गया था।

मेरे मुरैना प्रवास के दौरान पूर्व दस्यु मुन्ना सिंह मिर्धा से हुई बातचीत इस यथार्थ को मानवीय धरातल पर समझने का अवसर देती है।आज की पीढ़ी के लिए उनका संदेश अनुभवजन्य है,उन्होंने कहा कि चाहे कम आय में गुज़ारा कर लो परन्तु किसी गलत रास्ते पे मत चलो।
उन्होंने यह स्वीकार किया कि शिक्षा और सही मार्गदर्शन मिला होता, तो वह कभी दस्यु नहीं बनते, जो शिक्षा के महत्व को बताता है।

मैं उनके इंटरव्यू के लिए जब उनके घर पहुँची,तो बच्चों का बड़ों के प्रति सम्मान, शालीन व्यवहार और संवाद की गरिमा से मुझे उनके द्वारा अपने परिवार को दिए संस्कारों पे नाज़ हुआ कि उन्होंने अपने काले अतीत की छाया अपने परिवार पर नहीं पड़ने दी।उनका परिवार आज खेती-बाड़ी और पशुपालन से जुड़ा है।यह उदाहरण बताता है कि किस प्रकार एक पूर्व दस्यु ने अपने अतीत के अनुभवों को आत्मसात कर अपने परिवार के भविष्य को ईमानदार श्रम और नैतिक मूल्यों की दिशा में मोड़ा जोकि पुनर्वास की वास्तविक कसौटी है। विरप्पन के बारे में पूछने पर वह हंस पड़े की मेरी मुछे और चेहरा विरप्पन से मिलता है।

चंबल की बदलती पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका पर्यावरणीय पुनरुत्थान भी है। चंबल नदी में पाए जाने वाले घड़ियाल स्वच्छ, प्रवाही और प्रदूषण-मुक्त जल के एकमात्र प्रमाणिक जैव-संकेतक माने जाते हैं। उनकी निरंतर उपस्थिति यह संकेत देती है कि चंबल आज न केवल ऐतिहासिक रूप से, बल्कि पारिस्थितिकी रूप से भी पुनर्जीवित हो रही है। मिर्धा जी का कहना था कि उन्होंने आधी से ज्यादा जिंदगी बीहड़ में गुज़ारी परन्तु आज तक किसी सांप बिच्छू ने उन्हें नहीं काटा, दस्यू इन जीवों मे साथ सह अस्तित्व को अधिक महत्व देते हैं।और अनजाने में ही सही इकोसिस्टम के खाद्य जाल को स्वीकारते हैं।

इतिहास की एक जटिल सच्चाई यह भी है कि दस्यु, अनजाने में ही सही, लंबे समय तक चंबल नदी और उसके बीहड़ों के एक प्रकार के संरक्षक रहे। भय के कारण अवैध खनन, अंधाधुंध शिकार और बाहरी अतिक्रमण सीमित रहे। यह तथ्य हिंसा का महिमामंडन नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि संरक्षण कभी-कभी विरोधाभासी परिस्थितियों में भी घटित होता है।

आज यह संक्रमण स्पष्ट दिखाई देता है। पूर्व दस्यु मुख्यधारा में लौटकर समाज और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ रहे हैं। श्री कल्पतरु संस्थान द्वारा संचालित अभियान “पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़” इसी परिवर्तनशील चेतना का प्रतीक है—जहाँ कभी भय का पर्याय रहे भूभाग को संरक्षण और जिम्मेदारी के क्षेत्र में बदला जा रहा है।

हालाँकि अपराध का स्वरूप बदला है, समाप्त नहीं हुआ। आज की दस्युता बंदूक नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों में प्रकट होती है—साइबर ठगी, वित्तीय धोखाधड़ी और डिजिटल गिरफ्त जैसी प्रवृत्तियाँ यह बताती हैं कि चुनौती अब केवल कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि नैतिक दिशा की है।

चंबल की कहानी से दो व्यापक निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, अपराध को केवल व्यक्तिगत दोष के रूप में नहीं देखा जा सकता, यह सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत असंतुलन का परिणाम होता है। दूसरा, परिवर्तन संभव है, यदि शिक्षा, संवाद, और संरक्षण की नीति को और समाज के केंद्र में रखा जाए।

आज चंबल केवल अतीत की हिंसक स्मृतियों का भूगोल मात्र नहीं है। यह उस संभावना का प्रमाण है कि समाज अपने अनुभवों से सीख लेकर उज्जवल भविष्य गढ़ सकता है। यही वह बिंदु है जहाँ चंबल बीहड़ों से निकलकर मुख्यधारा में प्रवेश करती है।

“साहित्य और विचार का काम यही है कि वह समाज को उसकी ही गलतियों से सावधान करे।”
— आल्बेयर कामू

 

 

उमा व्यास (आरएएस) लेखिका विभिन्न समसामयिक मुद्दों की जानकार एवं श्री कल्पतरू संस्थान की सक्रिय कार्यकर्ता है

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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