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हाईकोर्ट ने कहा- सजा से पहले सजा न्याय नहीं:आरोपी बिना ट्रायल 6 साल से जेल में, यह न्यायिक प्रक्रिया की विफलता, जमानत दी

राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना सजा के आरोपी को 6 साल से ज्यादा समय तक जेल में रखने पर हैरानी और नाराजगी जताई है। कोर्ट ने इसे स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंखन बताया है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की अदालत ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी के तत्कालीन चेयरमैन शैतान सिंह को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि जब न्यायिक प्रक्रिया स्वयं दंडात्मक स्वरूप ले ले, तो यह कानून के शासन के लिए खतरनाक संकेत हैं।

आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा ने बहस करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ जिन धाराओं में चार्जशीट पेश की गई, उसमें अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान है। वहीं आरोपी पिछले 6 साल 4 महीने से जेल में है।

मामले में चार्ज भी फ्रेम नहीं हुए

उन्होंने अदालत को बताया कि आरोपी 20 सितंबर 2019 से जेल में है। आरोपी के खिलाफ एसओजी साल 2020 में जांच पूरी कर चुकी है। आरोपी के पास से कोई रिकवरी भी नहीं हुई है। मामले में सह अभियुक्त देवी सिंह सहित 12 आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

मामले में अभी तक चार्ज भी फ्रेम नहीं हुए हैं। ऐसे में ट्रायल में ज्यादा समय लगेगा।

देरी की वजह आरोपी पक्ष

जमानत का विरोध करते हुए सरकार की ओर से कहा गया कि ट्रायल में देरी का कारण आरोपी पक्ष है, क्योंकि वे चार्ज के मुद्दे पर दलीलें देने के लिए लगातार समय मांग रहे हैं। आरोपी पक्ष की ओर से दलीलें देने के लिए कम से कम 60 बार सुनवाई स्थगित करने की मांग की गई है, इसलिए मामला अभी भी चार्ज की स्टेज पर पेंडिंग है।

सरकार की ओर से कहा गया कि आरोपी आदतन अपराधी है, उसके खिलाफ 38 अन्य मामले दर्ज हैं। मामला करोड़ों रुपए के घोटाले से संबंधित है, इसलिए अपराध की गंभीरता को देखते हुए, याचिकाकर्ता को जमानत का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।

सजा से पहले सजा न्याय नहीं

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अदालत ने इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया की विफलता बताते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा- किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका अपराध विधि अनुसार सिद्ध नहीं हो जाए। ऐसे में उसे सालों तक जेल में बंद रखना, वास्तव में सजा देने के समान है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल में देरी का भार अकेले आरोपी पर नहीं डाला जा सकता, विशेषकर तब, जब रिकॉर्ड यह दर्शाता हो कि अभियोजन स्वयं मामलों को आगे बढ़ाने में अपेक्षित तत्परता नहीं दिखा रहा है।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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