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संचार क्रांति के बावजूद बही-खाता का क्रेज आज भी, दीपावली पर होता है पूजन

जैसलमेर : दिन बदले, जमाने बदले, बदल गया इंसान, नहीं बदली तो पुरानी परंपराएं, जो आज भी जारी है. दीपावली की पूजा के बाद आज भी कई व्यापारी बही-खाता हिसाब-किताब, कलम-पेरू से करते हैं. भले ही देश 21वीं सदी में जी रहा है और टेक्नोलॉजी व कंप्यूटर का युग है, जिसमें हर कार्य चंद मिनटों में हो जाता है. फिर भी कई लोग हैं, जो आज भी अपनी पुरानी परम्पराओं का निर्वाह कर रहे हैं. पांच दिवसीय दिवाली का त्यौहार शुरू हो गया है. दीपावली के मौके पर कई तरह की पूजा की जाती है. इस पूजा में बही खाता पूजन भी शामिल है. कम्प्यूटर ने आज भले ही बही खाता की जगह ले ली हो लेकिन इसके महत्व को भुलाया नहीं जा सकता.

जब दीपावली आती है तो बही खाता की पूजा की जाती है. अगर व्यापारियों की बात की जाए तो वे बही खातों से ही पूजन करते हैं. इस दिन व्यापारी बही खातों के अलावा तराजू और नाप तौल के औजारों की भी पूजा करते हैं.  कई व्यपारियो का मानना है कि जितने भी ऋषि-मुनियों ने जितने भी ग्रंथ लिखे, वो सभी कलम-दवात से लिखे गए, जो अमिट है और उनकी लिखावट आज भी वैसी ही है. जिन्हें आज की पीढ़ी देखकर चौक जाती है कि कितना बदल गया जमाना. आज से 20 से 25 वर्ष पहले जब बच्चे स्कूल में जाते थे, उनके गुरुजी हैंड राइटिंग सुधारने के लिए छात्र-छात्राओं से कलम-दवात का प्रयोग करने के लिए कहते थे, जिससे राइटिंग सही क्रमबद्ध हो, लेकिन अब जमाना बदल गया है.

ऐसी मान्यता है कि दीपावली के दिन से व्यापारियों का नया साल शुरू होता है. इसलिए दीवाली का दिन दुकानदार और व्यापारियों के लिए काफी खास है और इसी दिन बही खाते में काम शुरू होता है. दीपावली के दिन व्यापारी बही खातों, तराजू और गल्ला से ही लक्ष्मी और गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं. दीपावली का दिन बही खातों के लिए भी शुभ मुहूर्त होता है. इस दिन बही खाता बदलने के खास दिन है. बही खातों के पूजन से पहले शुभ मुहूर्त के तहत केसर युक्त चंदन या फिर लाल कुमकुम से स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है.

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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