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बेनीसागर तालाब भारत के दृष्टि पटल में रखता है अग्रणी स्थान

मधुलता पांडेय। झारखंड प्रदेश अंतर्गत चाईबासा जिला का मझगाँव प्रखण्ड के बेनीसागर तालाब भारत के दृष्टि पटल में अग्रणी स्थान रखता है । लोक कथा के अनुसार इस तालाब का निर्माण पाँचवी सदी से सातवीं सदी के बीच राजा बेनु संभवत राजा बेनी ने खुदवाया था । इसके पीछे की कहानी बुजुर्गौं के अनुसार राजा बेनी बहुत बड़े दानवीर थे । जो भी वचन देते थे वो हर संभव पूरा करते थे । लेकिन एक दिन एक साधु भिक्षा माँगने आया । राजा ने साधु से भिक्षा में जो भी दिल करे माँगने को कहा । साधु ने भिक्षा में न सोना चाँदी न हीरे जवाहरात और न ही अन्न माँगा बल्कि उनके एकलौते पुत्र को भिक्षा में माँग बैठा । पुत्र मोह में साधु को हर प्रकार पर समझाने के बावजूद नहीं माना । राजा के द्वारा अपना वचन पूरा नहीं करने पर साधु ने अभिशाप दिया कि तुम्हारा पुत्र को बाघ खा जाएगा । कहा जाता है कि एक ही रात में तालाब को खुदवाया गया एंव ऊँचे टीले पर राजकुमार के लिए महल बनवाया एव तरह तरह के तेलीय चित्र दीवारों पर टाँगा गया । राजा खुद नौका पर सुबह जाते व संध्या में वापस होते । इसी दरमियान एक दिन जब वह सुबह राजकुमार के महल में पहूँचे तो देखा कि एक बाघ जिसके मुँह में खुन लगा था निकल रहा था । वे समझ गये कि राजकुमार अब इस दूनिया में नहीं रहा । महल जाकर देखते हैं कि राजकुमार मरा पड़ा है । उसे साधु के अभिशाप की याद आ गया । उसी समय राजा रानी राज पाट छोड़कर अज्ञात वास को निकल गये । बुजूर्गों के अनुसार बेनीसागर में तालाब के बीच एक सोने की देवी मंदिर हुआ करता था । जिनके चार दरवाजे हुआ करता था ।जिसमें चार पसरेदार होते थे । एक पसरेदार घड़ियाल,एक पहरेदार बाघ,एक पहरेदार सर्प व एक पहरेदार मनुष्य । राजा बेनी के समय से ही रास पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक बकरा की बलि दी जाती है व देउरी ( पुजारी ) कमर तक पानी में घुसकर बकरा का सिर अर्पित करते हैं जो पानी के ऊपर कभी नहीं आया । आज तक उसी परम्परा से पूजा किया जाता है । विशेषता यह है कि ग्रामीण बुजूर्गों के अनुसार आज तक कभी भी ये तालाब नहीं सुखी है । पुरातत्व विभाग के द्वारा इस जगह की खुदाई में जानकारी मिली है कि बेनीसागर अथवा बेनूसागर नाम संभवतः बेनू राजा के नाम पर पड़ा । जिन्होंने शायद इस विशाल तालाब का निर्माण करवाया था । तालाब करीब 340 मीटर लम्बा और 300 मीटर चौड़ा है जिसके बारे में कर्नल टिक्केल ने पहली बार उल्लेख अपने रिर्पोट में इस स्थान का भ्रमण सन् 1840 ईo में करने के बाद किया था । बाद में श्री बेगलर ने इस तालाब का भ्रमण 1875 ईo में किया था । जिन्हें कुछ मुर्तियाँ मिली और जिनके आधार पर उन्होंने इस स्थान का तिथि निर्धारण सातवीं शताब्दी ईo में किया।यधपि स्थानिय परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि इस तालाब को राजा बेनु ने खुदवाया था ।पुरातत्विक दृष्टि कोण से अभी तक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि वास्तव में किसने इस तालाब का निर्माण किया । तालाब से लगभग 100 मीटर की दूरी पर पूर्व और दक्षिण पूर्व दिशा की ओर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हाल ही में पुरातत्विक उत्खनन के दौरान दो पँचायतन मंदिर परिसर कुछ धर्म निरपेक्ष भग्नावेष एंव कई मूर्तियाँ को प्रकाश में लाया है जिसमें सूर्य,भैरव,लकुलोश,अग्नि ,कुबेर आदि मूर्तियाँ प्रमुख है । इसके अलावा उत्खनन के दौरान एक पत्थर की सील ( मुहर ) मिली है जिस पर प्रियांगु धेयम् चतुविध (चतुर्विध) खुदा हुआ है – जिसका मतलब होता है कि एक व्यक्ति जिसका नाम प्रियांगु था वह चारों वेदों में निपुण था । लेख की लिपि ब्राह्मी है और भाषा संस्कृत – जिसके आधार पर इसका तिथि निर्धारण पाँचवीं सदी ईo से लेकर सोलहवीं – सत्रहवीं शताब्दी ईo तक लगातार बसा रहा अब यहाँ पर तालाब की सफाई व पार्क की व्यवस्था है । पड़ोसी राज्य ओड़िशा व दूर दराज से सैलानी यहाँ आते हैं गर्मी के मौसम में इस तालाब में देश विदेश की पक्षियाँ पहूँचते हैं ।
कैसे पहूँचे:
नजदीकी रेल्वे स्टेशन चक्रधर पूर व चाईबासा ट्रेन व 76 किलोमीटर का सफर बस व प्राईवेट गाड़ी से.

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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