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कांग्रेस को अलविदा कहने का सिलसिला जारी, पिछले एक माह में आधा दर्जन नेताओं ने किया टाटा, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर: दिग्गज नेताओं के कांग्रेस पार्टी छोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है.पिछले एक माह में करीब आधा दर्जन नेता कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं.ऐसे में सवाल लाजिमी है कि आखिर लगातार उसके नेता कांग्रेस को क्यों टाटा बोल रहे हैं.दरअसल सबसे बड़ी वजह है हाईकमान और नेताओं के बीच एक बड़ा कम्यूनिकेशन गेप हो गया है.अधिकतर पार्टी छोड़कर गए नेताओं का कहना है कि वह अपना दुखड़ा किसे बयां करें.वहीं जांच एजेसिंयों का डर,राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाने और पद नहीं देने के चलते भी नेताओं का कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है.

महाराष्ट्र में पिछले एक माह में तीन नेता कद्दावर नेता कांग्रेस छोड़कर चले गए.मिलिंद देवड़ा से शुरुआत हुई और उसके बाद बाबा सिद्दीकी कांग्रेस से रुखसत हो गए.चंद दिनों बाद ही फिर पूर्व सीएम अशोक चव्हाण ने भी हाथ का साथ छोड़ दिया.लालबहादुर् शास्त्री के पौत्र विभाकर शास्त्री ने भी कांग्रेस को नमस्ते बोल दिया.इससे पहले 2014 के बाद कांग्रेस के कितने नेता पार्टी छोड़कर चले गए इसकी एक लंबी फेहरिस्त है और अब राजस्थान में कद्दावर नेता महेन्द्रजीत सिंह मालवीय की भी विदाई तय है.सवाल आखिर यह है कि इतने नेता बैक टू बैक पार्टी छोड़कर गए क्यों.

आलाकमान और नेताओं के बीच कन्यूनिकेशन गेप:
कांग्रेस छोड़कर गए अधिकतर नेताओं की एक कॉमन पीड़ा है.उनका कहना था कि हाईकमान से मिलने और अपना पक्ष रखने की कईं बार हमने कोशिशे की लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला.लिहाजा मजबूर होकर पार्टी छोड़ने का रास्ता अख्तियार करना पड़ा है.दरअसल सोनिया गांधी के बीमार होने के बाद सारी पावर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के पास आ गया है.दोनों अपनी टीम की वर्किंग स्टाइल के चलते नेताओं से टूट गए.उदयपुर चिंतन शिविर में सोनिया गांधी ने सभी लीडर्स के सामने इस बात को स्वीकार भी किया था.लेकिन अफसोस इस ढर्रे में अब भी कोई बदलाव नहीं आ रहा.

साउथ लॉबी कांग्रेस में हावी:
दरअसल पार्टी के अहम पदों पर साउथ के नेता ज्यादा काबिज है.अध्यक्ष खरगे,वेणुगोपाल, जयराम रमेश और बी श्रीनावसन ये सब नेता साउथ से है.फैसले लेने में वेणुगोपाल,खरगे और जयराम की तिकड़ी का बड़ा रोल इन दिनों है.लेकिन तीनों नेताओं की कार्यशैली अधिकतर नेताओं की पसंद नहीं आ रही है.सबसे ज्यादा पावरफुल इनमें वेणुगोपाल है.लेकिन वो मसलों को ढंग से हैंडल करनें में कामयाब नहीं दिख रहे.वहीं छोड़कर गए नेताओं ने भी इनको गंभीर नहीं लिया.पहले अहमद पटेल जैसे नेता संकट में मसलों को समय रहते निपटा लेते थे.

जांच एजेसिंयों की रेड का डर:
हालांकि इनके अलावा जनाधारी नेताओं में जांच एजेसिंयों के एक्शन का भी डर है.कईं जनाधार वाले नेता संकट के समय भी पार्टी की विचारधारा से नहीं डिगे पर जांच एंजेसिंयों की कार्रवाई से परेशान होकर पार्टी छोड़कर चले गए.इसमें असम के सीएम और अशोक अशोक चव्हाण जैसे नेताओं की एक लंबी सूची है.

पद की महत्वाकांक्षा:
कांग्रेस की सत्ता अब गिने चुने राज्यों में सिमटकर रह गई है और दो साल से केन्द्र से भी बेदखल हो गई है.ऐसे में सत्ता में रहने के आदि कांग्रेस नेताओं को बिना पद के रहने बेहद कचोटता है.लिहाजा कोई राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाने से खफा हो गया तो कोई टिकट और पद नहीं मिलने के चलते कांग्रेस छोड़कर चले गए.

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जाहिर सी बात है कि लगातार नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस बेहद डैमेज हुई है.कार्यकर्ताओं में हताशा घर कर चुकी है.लेकिन अफसोस फिर भी कांग्रेस रणनीतिकार बदलावों से परहेज कर रहे है.जल्द ठोस फैसले लेने का वहीं पुराना तरीका.लेकिन ऑन कैमरा पार्टी नेता अब भी इस हकीकर को स्वीकार नहीं कर रहे हैं.छोड़कर गए नेताओं को मौकापरस्त करार दे रहे हैं. भारत में सबसे ज्यादा सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पार्टी आज अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है.अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.आंतरिक लोकतंत्र की मजबूती का दावा करने वाली पार्टी में नेताओं का आलाकमान से संपर्क टूटना बहुत ही सोचनीय विषय ह

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Author: Kashish Bohra

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