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साढ़े 3 करोड़ रुपए बदलने से कोर्ट का इनकार,अब रद्दी:नोटबंदी के रखे थे 500-1000 के नोट; हाईकोर्ट ने कहा- परेशानी बताकर राहत नहीं मांग सकते

नोटबंदी के 9 साल बाद साढ़े 3 करोड़ रुपए के पुराने नोट बदलने से कोर्ट ने इनकार कर दिया है। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने 19 दिसंबर को सुनाए अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में 500 और 1000 रुपए के पुराने नोटों को बदलने या जमा करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। ये नोट अब रद्दी हो गए हैं।

बाड़मेर जिले की दुधु ग्राम सेवा सहकारी समिति ने 16 लाख रुपए के 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बदलने के लिए मार्च 2017 में याचिका लगाई थी। इसके अलावा बाद में 6 प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समितियों (पैक्स) ने भी अपने पुरानी करेंसी के करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए बदलने के लिए अलग-अलग याचिका लगा दी थी।

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की डिवीजन बेंच ने दुधु ग्राम सेवा सहकारी समिति सहित 7 याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा- आर्थिक नीतियों में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश बहुत सीमित है। आरबीआई द्वारा जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCB) पर लगाई गई रोक जनहित में लिया गया सही फैसला था।

कोर्ट ने फैसले में लिखा–

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महज कठिनाई या असुविधा, चाहे वह कितनी ही वास्तविक क्यों न हो। किसी वैध आर्थिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए उठाए गए नियामक उपायों (Regulatory Measures) को अवैध ठहराने का आधार नहीं हो सकती।

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नोटबंदी के समय समिति के पास 16 लाख रुपए के 500 और 1000 रुपए के नोट रखे हुए थे। इसे बदलने के लिए ही समिति ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। फोटो सोर्स: एआई जेनरेटेड।
नोटबंदी के समय समिति के पास 16 लाख रुपए के 500 और 1000 रुपए के नोट रखे हुए थे। इसे बदलने के लिए ही समिति ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। फोटो सोर्स: एआई जेनरेटेड।

नोटबंदी के समय रखी थी 16 लाख से ज्यादा की पुरानी करेंसी बाड़मेर जिले की दुधु ग्राम सेवा सहकारी समिति ने याचिका में बताया था कि 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा के समय उनके पास 16 लाख 17 हजार 500 रुपए (500 और 1000 के नोट) की नकदी मौजूद थी।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि ये पैसा किसानों और आम लोगों का है, जो वैध तरीके से समिति के पास आया था। लेकिन आरबीआई ने 14 और 17 नवंबर 2016 को सर्कुलर जारी कर जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCB) को पुराने नोट स्वीकार करने से रोक दिया। वकील ने कहा- एक ही तरह की अन्य सोसायटियों ने नोट जमा करवा दिए, लेकिन याचिकाकर्ता को अनुमति न देना भेदभावपूर्ण है।

इस समिति के अलावा बामनोर, बिसरणिया, खुडाला, पुरावा, भीमथल और मंगता ग्राम सेवा सहकारी समितियां प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसायटी (PACS) के रूप में जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCB) के जरिए काम करने वाली समितियों ने भी अपने साढ़े 3 करोड़ रुपए के पुराने नोट बदलने के लिए याचिकाएं दायर की थी।

इनकी मांग थी कि 14 और 17 नवंबर 2016 के आरबीआई सर्कुलर को अवैध और RBI Act-1934 की धारा 26 (2) के खिलाफ घोषित कर रद्द किया जाए। ताकि ये समितियां अपने पुराने नोट जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के माध्यम से जमा करा सकें। या नाबार्ड को नोटों की जांच कर वैधानिक निपटान करने का निर्देश दिया जाए।

RBI, केंद्र व राज्य सरकार का तर्क: ‘मनी लॉन्ड्रिंग का खतरा था’ केंद्र सरकार और आरबीआई की ओर से पेश वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि यह फैसला “काले धन को सफेद” (मनी लॉन्ड्रिंग) होने से रोकने के लिए लिया गया था। वकीलों ने बताया कि जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCB) और पैक्स (PACS) का ढांचा कॉमर्शियल बैंकों जैसा नहीं है।

वहां उस समय ऑडिट इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी तैयारियों में कमियां थीं। इससे नोटबंदी की प्रक्रिया के दौरान गड़बड़ी की आशंका थी। इसी आशंका को देखते हुए 14 और 17 नवंबर 2016 के सर्कुलर के जरिए इन पर पुराने नोट स्वीकार करने की रोक लगाना नीति निर्णय था। इसमें अदालत को सीमित दखल देना चाहिए।

​सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा ‘विवेक नारायण शर्मा बनाम भारत संघ’ (2 जनवरी 2023) मामले में दिए गए निर्णय का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक और मौद्रिक नीति के मामलों में अदालतों को तब तक दखल नहीं देना चाहिए, जब तक कि फैसला पूरी तरह से मनमाना या असंवैधानिक न हो।

पुराने नोटों को बदलने के लिए अन्य समितियों ने भी याचिका दायर की थी। फोटो सोर्स: एआई
पुराने नोटों को बदलने के लिए अन्य समितियों ने भी याचिका दायर की थी। फोटो सोर्स: एआई

कोर्ट ने कहा- आरबीआई के खिलाफ नहीं दे सकते जांच की अनुमति कोर्ट ने पाया कि आरबीआई के सर्कुलर मनमाने नहीं थे, बल्कि वित्तीय अखंडता (Financial Integrity) सुनिश्चित करने के लिए जारी किए गए थे। कोर्ट ने कहा- नाबार्ड (NABARD) की भूमिका केवल पर्यवेक्षी है। वह आरबीआई के बाध्यकारी निर्देशों के खिलाफ जाकर नोटों की जांच या निपटान की अनुमति नहीं दे सकता।

इन तर्कों के आधार पर कोर्ट ने दुधु ग्राम सेवा सहकारी समिति, बामनोर, बिसारनिया, खुडाला, पुरावा, भीमथल और मंगता ग्राम सेवा सहकारी समितियों की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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