झालावाड़ स्कूल हादसे के बाद भी जर्जर भवनों में स्कूलों के संचालन को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। जस्टिस महेंद्र गोयल और जस्टिस अशोक जैन की अदालत ने मामले में मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा- विभाग के अधिकारी आग से नहीं खेलें।
कोर्ट ने कहा- हमने जर्जर भवन में क्लासेज संचालित करने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। इसके बाद भी बूंदी के भैंसखेड़ा स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय की छत गिरने की घटना हो गई। अदालत ने घटना पर संज्ञान लेते हुए शिक्षा सचिव सहित प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा निदेशक को 2 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित रहने के निर्देश दिए।
अदालत ने कहा- जुलाई 2025 में झालावाड़ जिले में स्कूल भवन गिरने से सात स्टूडेंट्स की मृत्यु हो गई थी। कोर्ट के आदेश के बाद भी हालात नहीं सुधरे हैं।
मामले में न्यायमित्र तन्मय ढंढ ने अदालत को बूंदी स्कूल हादसे की जानकारी दी थी।
टेक्निकल सर्वे के बाद भी संचालन क्यों? हाईकोर्ट ने कहा-
झालावाड़ हादसे के बाद सरकार ने प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों का प्रारंभिक सर्वे करवाकर कहा था कि पूरे प्रदेश में करीब 86 हजार क्लासरूम जर्जर हालात में हैं।

उसी दिन हाईकोर्ट ने इन क्लासरूम में क्लासेज लगाने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद विभाग ने टेक्निकल सर्वे भी करवाया था। ऐसे में विभाग बताए कि बूंदी के जिस स्कूल की छत गिरी है, उस स्कूल की क्लासेज को किस श्रेणी में रखा गया था।
क्या जर्जर क्लासेज की श्रेणी के बावजूद वहां कक्षाएं संचालित की जा रही थी? वहीं इतने माह बाद भी जर्जर क्लासेज को ठीक करने के लिए सरकार ने क्या किया? इन तमाम बातों का जवाब देने के लिए अधिकारी कोर्ट में उपस्थित रहें।
दरअसल, 25 जुलाई को झालावाड़ के मनोहरथाना ब्लॉक के पिपलोदी सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 बच्चों की मौत हो गई थी। 21 बच्चे घायल हुए थे। वहीं 13 जनवरी को बूंदी में सरकारी स्कूल के बरामदे की करीब 50 फीट लंबी छत अचानक गिर गई। गनीमत रही कि उस समय वहां कोई स्टूडेंट बैठा हुआ नहीं था। बच्चे वहां से करीब 50 फीट दूर धूप में बैठकर पढ़ रहे थे।





