जयपुर में 80 साल पूराना पतंगाों का बाजार। इसकी शुरुआत सिर्फ तीन दुकानों से हुई थी। आज यहां 100 से ज्यादा दुकानें हैं। जहां पूरे साल पतंगें बेची जाती हैं। मकर संक्रांति से पहले यहां मेले सा माहौल रहता है। इस मार्केट पर मकर संक्रांति के समय दिल्ली और बरेली से भी लोग पतंग डोर बेचने के लिए आते हैं।
हांडीपुरा के अब्दुल गफ्फार अंसारी ने बताया- 50 साल से ज्यादा समय से यहां पतंग का कारोबार कर रहे हैं। उनके परिवार के लोग पतंगबाजी का काम शुरू किया था। उस दौर में यहां गिनीचुनी दुकान हुआ करती थी। आज इस जगह को जयपुर में पतंग के लिए सबसे पुराने बाजार हांडीपुरा के नाम से जाना जाता है।
बता दें कि करीब आज से 80 साल पहले इस मार्केट में पतंग मंडी लगा करती थी। जो मोमिनान मोहल्ले में जगनाथ शाह के खुर्रे पर लगा करती थी। अब उस मंडी का रूप महज कुछ दिनों तक सीमित रह गया है। जो मकर संक्रांति में लगता है। साल के 12 महीने इस बाजार में पतंग डोर बेची जाती है।
खास बात यह है कि जयपुर शहर में जितनी पतंगे बनाई जाती है, उसकी 80 फीसदी पतंगों की बिक्री यहीं से होती है। यहीं से शहर के अन्य इलाकों सहित देश के बड़े शहरों में पतंगों की यहीं से सप्लाई होती है।

जगन्नाथ शाह ने सिखाया मुस्लिम समाज के लोगों को पतंग बनाना
हांडीपुरा में पतंग और डोर बेचने वाले मोहम्मद जाफरी ने बताया- हांडीपुरा 80 साल जगन्नाथ शाह के खुर्रे तक सीमित था। अब इसका दायर दो से तीन चौराहे तक हो गया है। यहां दुकानों की संख्या भी अब सैकड़ों में हो गई है।
उन्होंने उस दौर के खास पतंग बनाने वाले जगन्नाथ शाह के बारे में बताया जो कि नाथ सम्प्रदाय (योगी) से थे। उन्होंने उस दौर में मुस्लिम समाज के लोगों को पतंग बनाना सिखाया। इसकी बदौलत कई मुस्लिम समाज के लोगों ने उनसे पतंग बनाने के हुनर को सीखा।

अब कलकत्ता और आसाम से आ रहा पतंग बनाने का सामान
उन्होंने बताया- उस दौर में पतंग के लिए सारा सामान यहीं तैयार होता था। पतंग के कागज से लेकर काप, ठंडा सब यहीं बनाए जाते थे। पतंग बनाने के लिए कागज भी यहीं तैयार किए जाते थे। उस दौर में बड़े-बड़े बांसों को यहीं छीला जाता था। इसके बाद उन्हें काटकर कमान और ठंडा तैयार किया जाता था।
फिर कागज पर इनकों चिपकाकर पतंग तैयार की जाती थी। उस दौर में लाइट नहीं होती थी। तब चिमनी की रोशनी में भी लोग पतंग बड़े आराम से बनाया करते थे। उस दौर मेंएक आने में भी कई पतंग आ जाया करती थीं। जो अब सैंकड़ों रुपए कोड़ी हो गई है। वहीं, अब पतंग के काम आने वाली काप और ठंडा भी कलकत्ता और आसाम से रेडिमेड ही आ रहा है। इसे कागज पर चिपकाकर पतंग तैयार की जाती है।

20 करोड़ से दोगुना व्यापार होने की उम्मीद
पिछली मकर संक्राति पर इस अकेले बाजार से 20 करोड़ रुपए के व्यापार होने का अनुमान था। पतंग कारोबारियों की माने तो इस बार पिछली बार से दोगुना व्यापार होने की उम्मीद है।
आज ऑनलाइन भी होती पतंगों की डिलवरी
मोहम्मद अमीन अंसारी ने बताया- हमारी तीसरी पीढ़ी पतंग का काम कर रही है। 80 साल पहले मेरे दादाजी साहब उस्ताद अब्दुल हकीम अंसारी उस दौर में फैंसी पतंगे बनाया करते थे। उसके बाद मेरे पिता मोहम्मद शाहिद अहमद अंसारी भी पतंग का ही काम करते थे। इसके बाद अब हमारी तीसरी पीढ़ी में मैं और मेरा भाई मोहम्मद आसिफ अंसारी भी पतंग का कारोबार कर रहे हैं। हमारा यह कारोबार 12 महीने चलता है। हम उज्जैन, इंदौर, बेंगलुरु, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, लखनऊ सहित कई शहरों में पतंग बेचते हैं। समय के साथ आज ऑनलाइन ऑर्डर की भी व्यवस्था है।

जयपुर में पतंग बनाना पड़ रहा महंगा
हांडीपुरा में कल्लू भाई नाम से पतंग बेचने वाले मोहम्मद निजाम कुरैशी ने बताया- मेरे पिता पतंग का काम किया करते थे। उसके बाद मैं भी इस कारोबार को जारी रखा। मेरे दोनों बेटे भी इसी कारोबार से जुड़े हैं। हम राजस्थान के कई जिलों में पतंग सप्लाई करते हैं। उन्होंने बताया कि आज के दौर में बरेली की पतंग ज्यादा बिकती हैं। जयपुर शहर में मजदूर कम होने और पतंग बनाने की कीमत ज्यादा पड़ने के कारण कारोबार पर फर्क पड़ा है।
यहां पतंगें 50 रुपए और 100 रुपए कौड़ी (20 पतंगे) से शुरू होकर के 500 तक बेची जा रही है। इन पतंगों में धायवली, मजोली, अद्दा, पोना, तावा पतंगें पेपर के साइज के हिसाब से तैयार किए जाते हैं। इस नाम से ही इन पतंगों को मांगा जाता हैं।

हांडीपुरा में बनती प्रतिदिन 2 लाख पतंगे
हांडीपुरा में 365 दिन पतंग डोर का कारोबार करने वाले नासिर ने बताया- उनके दादा-नाना पतंग कारोबार ही करते थे। उनकी सभी पीढ़ियां इसी कारोबार को कर रही हैं। उन्होंने बताया- वे तीसरी पीढ़ी के रूप में पतंग कारोबार कर रहे हैं।
उन्होंने बताया- दादा जिस दौर में कारोबार करते थे। उस वक्त इस बाजार में सिर्फ तीन दुकान हुआ करती थी। उनके दादा अब्दुल गनी और नाना बशीर उसे दौर से पतंग बनाया करते थे जिस दौर में आठ आने की पतंग बिका करती थी। आज के समय में वह आठ आने की पतंग 8 रुपए की हो गई है।
उन्होंने बताया कि बदलते वक्त के दौर पर पतंग की डिजाइन भी बदली है। पूरे एशिया में दो लाख पतंगे जयपुर शहर से ही सप्लाई की जाती है। हांडीपुरा में 2 लाख पतंगे प्रतिदिन बनती है।






