पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने बताया कि अरावली को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा फैलाया जा रहा यह दावा कि “90 प्रतिशत अरावली समाप्त हो जाएगी”, पूरी तरह असत्य और भ्रामक है। वास्तविक स्थिति यह है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा हिरसा अभ्यारण्य, राष्ट्रीय उद्यान और आरक्षित वनों में आता है, जहाँ खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अलावा, पूरे अरावली क्षेत्र में से केवल लगभग 2.56 प्रतिशत क्षेत्र ही सीमित, नियंत्रित और कड़े नियमों के तहत खनन के दायरे में आता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब तक इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्टरी रिसर्च एंड एजुकेशन द्वारा अरावली क्षेत्र का डिटेल्ड साइंटिफिक मैपिंग और सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार नहीं हो जाता तब तक कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता। ऐसे में अरावली के नष्ट होने की बात करना गहलोत जी का सिर्फ भ्रम फैलाने का प्रयास है।
100 मीटर का मानदंड केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृत परिभाषा के अनुसार 100 मीटर या उससे ऊँची पहाड़ियों, उनकी ढलानों और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के क्षेत्र में आने वाली सभी भू-आकृतियाँ खनन पट्टे से पूरी तरह बाहर रखी गई हैं, चाहे उनकी ऊंचाई कुछ भी हो। यह व्यवस्था पहले से अधिक सख्त और वैज्ञानिक है।
“Save Aravalli “के नाम पर सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू
18 दिसंबर 2025 को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली बचाओ “Save Aravalli “के नाम पर सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू किया और अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदली। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा जी, न राहुल गांधी जी, न मल्लिकार्जुन खड़गे जी और न ही सचिन पायलट जी ने अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदली। यह साफ दर्शाता है कि जिस अभियान का दावा किया जा रहा है, उसमें स्वयं उनकी पार्टी का समर्थन भी उनके साथ नहीं है।
जब किसी मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेता भी साथ खड़े न हों, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह अभियान पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक दिखावा है। अरावली जैसे संवेदनशील विषय पर प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि न्यायालय के आदेशों और वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार ठोस कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
सर्वे ऑफ इंडिया के विश्लेषण से स्पष्ट है कि कमेटी की परिभाषा लागू होने पर अरावली क्षेत्र में खनन नहीं बढ़ेगा, बल्कि और अधिक सख्ती आएगी। राजस्थान के राजसमंद में 98.9%, उदयपुर में 99.89%, गुजरात के साबरकांठा में 89.4% और हरियाणा के महेंद्रगढ़ में 75.07% पहाड़ी क्षेत्र खनन से प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा, राष्ट्रीय उद्यान, इको-सेंसिटिव ज़ोन, रिज़र्व व प्रोटेक्टेड फ़ॉरेस्ट और वेटलैंड्स में खनन पूरी तरह बंद है।
वर्तमान में अरावली क्षेत्र के 37 ज़िलों में कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 0.19% (277.89 वर्ग किमी) हिस्सा ही कानूनी खनन पट्टों के अंतर्गत है जिसमें भी लगभग 90% खनन राजस्थान, 9% गुजरात और 1% हरियाणा तक सीमित है। इसलिए 90% अरावली हिल्स के खत्म होने की बात कानूनी और भौगोलिक रूप से पूरी तरीके से असत्य है।
केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव जी ने भी सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट कर दिया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से अरावली पर्वतमाला पर कोई आंच नहीं आएगी। केंद्र सरकार पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है कि अरावली को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा, अरावली पूर्णतः सुरक्षित और संरक्षित रहेगी । अरावली सुरक्षित है और रहेगी सरकार का रुख स्पष्ट है — अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और कानून का पालन सर्वोपरि है। भ्रम फैलाने से सच्चाई नहीं बदलती। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश, सरकारी रिकॉर्ड और वैज्ञानिक तथ्य यह सिद्ध करते हैं कि अरावली न पहले खतरे में थी, न आज है और न आगे होगी।
प्रेंसवार्ता में विधायक कुलदीप धनकड़, महेन्द्र पाल मीणा, प्रदेश मीडिया प्रभारी प्रमोद वशिष्ठ उपस्थित रहे।






