राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने बैंकिंग सेक्टर और एमएसएमई से जुड़े एक मामले में स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई MSME इकाई अपना लोन एक बैंक से दूसरे बैंक में ट्रांसफर (टेकओवर) करवाती है, तो उसे पहले बैंक को एग्रीमेंट के अनुसार प्री-पेमेंट चार्ज देना होगा।
जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने अमरभव पावर प्राइवेट लिमिटेड की अपील को खारिज करते हुए मंगलवार (20 जनवरी) को यह रिपोर्टेबल जजमेंट दिया। कोर्ट ने कहा कि MSME कोड के प्रावधान आपसी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को रद्द नहीं कर सकते।

विवाद 5.52 लाख रुपए की वसूली का
दरअसल, जोधपुर के कमला नेहरू नगर सेकंड एक्सटेंशन स्थित अमरभव पावर प्राइवेट लिमिटेड ने अपने बिजनेस विस्तार के लिए पंजाब नेशनल बैंक से संपर्क किया था। बैंक ने 22 दिसंबर 2015 को कंपनी के लिए क्रेडिट फैसिलिटी मंजूर की, जिसमें टर्बाइन मिल की स्थापना के लिए 2.76 करोड़ रुपए का टर्म लोन शामिल था।
लोन एग्रीमेंट में यह शर्त शामिल थी कि यदि लोन को किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्थान द्वारा टेकओवर किया जाता है, तो बकाया राशि पर 2% की दर से प्री-पेमेंट चार्ज लगेगा।
बाद में कंपनी ने लोन की अवधि पूरी होने से पहले ही पूरी राशि चुका दी, क्योंकि लोन दूसरे बैंक ने टेकओवर कर लिया था। इस पर पंजाब नेशनल बैंक ने एग्रीमेंट के अनुसार 5 लाख 52 हजार रुपए प्री-पेमेंट चार्ज के रूप में वसूल लिए। कंपनी ने इसे कॉमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी, जहां से खारिज होने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
वकील का तर्क: MSME कोड का उल्लंघन
याचिकाकर्ता कंपनी के वकील ने तर्क दिया कि बैंक ‘बैंक्स कमिटमेंट टू माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज कोड’ का हस्ताक्षरकर्ता है। वकील ने बताया कि इस कोड के पैराग्राफ 5.3(H) के तहत बैंकों को यह निर्देश है कि वे एमएसएमई इकाइयों से लोन के समयपूर्व भुगतान (फोर क्लोजर) पर कोई पेनल्टी न वसूलें।
वकील ने आगे तर्क दिया कि बैंक ने सूचना के अधिकार के तहत दिए गए एक जवाब में भी यह माना था कि एमएसएमई से अस्थायी लोन पर प्री-पेमेंट चार्ज नहीं लिया जा सकता। इसलिए, एग्रीमेंट की वह शर्त अवैध है और वसूली गई राशि लौटाई जानी चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण: एग्रीमेंट बनाम कोड
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाइपोथिकेशन एग्रीमेंट और एमएसएमई कोड के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। कोर्ट ने पाया कि एग्रीमेंट के क्लॉज 5(ii) में स्पष्ट लिखा है कि यदि लोन किसी दूसरे बैंक द्वारा टेकओवर किया जाता है, तो 2% चार्ज लगेगा।
कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा, ” एमएसएमई कोड का क्लॉज 5.3(H) और एग्रीमेंट की शर्तें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। कोड का नियम तब लागू होता है, जब कर्जदार अपने स्वयं के स्रोतों से लोन चुकाता है। लेकिन जब लोन दूसरे बैंक द्वारा टेकओवर किया जाता है, तो यह एक अलग स्थिति है, जो एग्रीमेंट की शर्तों से नियंत्रित होती है”।
कानूनी पहलू: विबंध का सिद्धांत
फैसले में कानूनी सिद्धांत ‘एस्ट्रोपल’ का भी हवाला दिया गया। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब कर्जदार ने अपनी मर्जी से एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर दिए, तो वह बाद में इसकी शर्तों को मानने से इनकार नहीं कर सकता। इसे कानून में ‘एप्रोबेट एंड रीप्रोबेट’ यानी एक ही समय में किसी चीज का फायदा लेना और उसे नकारना, कहा जाता है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।
‘सहानुभूति के आधार पर अनुबंध नहीं बदल सकते’
खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन बैंक ऑफ इंडिया बनाम कृपानिधि एजुकेशनल ट्रस्ट’ मामले का भी जिक्र किया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कोई भी न्यायिक मंच केवल सहानुभूति के आधार पर दो पक्षों के बीच हुए कॉमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को नहीं बदल सकता। एमएसएमई कोड स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं का एक दस्तावेज है, जो कानूनी अनुबंध की जगह नहीं ले सकता।
अंत में, कोर्ट ने यह कहते हुए अपील खारिज कर दी कि प्री-पेमेंट चार्ज की वसूली पूरी तरह से एग्रीमेंट के मुताबिक थी और इसमें कोई अवैधता नहीं है।





