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प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत ही है पूर्ण न्याय का आधार:राधेश्याम बत्रा

जयपुर। राजस्व न्यायालयों में प्रचलित कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाए जाने तथा अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रक्रियात्मक एवं विधिक पक्षों से भली-भांति अवगत कराने के उद्देश्य से मंगलवार को जिला कलेक्ट्रेट सभागार में एक दिवसीय जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यशाला का शुभारंभ जिला कलक्टर डॉ.जितेन्द्र कुमार सोनी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया।इस अवसर पर उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि प्रत्येक राजस्व प्रकरण में पारदर्शिता,विधिसम्मत प्रक्रिया एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि आमजन का विश्वास राजस्व न्याय प्रणाली में और सुदृढ़ हो।साथ ही उन्होंने अधिकारियों को यह भी निर्देशित किया कि लंबित प्रकरणों की नियमित समीक्षा की जाए,अनावश्यक स्थगन से बचा जाए तथा वादों का निस्तारण निर्धारित समय-सीमा में किया जाए।उन्होंने कहा कि राजस्व न्यायालयों में पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करना सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यशाला में राजस्थान प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी राधेश्याम बत्रा ने मुख्य वक्ता के रूप में राजस्व अधिकारियों को विस्तृत प्रशिक्षण प्रदान किया।उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि राजस्व न्यायालय आमजन के अधिकारों और भूमि संबंधी विवादों के समाधान का प्रमुख माध्यम हैं।अतःयह आवश्यक है कि प्रत्येक प्रकरण का निस्तारण निष्पक्षता,पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया के अनुरूप समयबद्ध रूप से किया जाए।उन्होंने स्पष्ट किया कि गुणवत्तापूर्ण आदेश लेखन,सटीक तथ्य विश्लेषण एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन प्रशासन की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है।

साथ ही उन्होंने राजस्व प्रकरणों के प्रभावी,समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के लिए विभिन्न अधिनियमों एवं नियमों की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से प्रक्रियात्मक त्रुटियों से बचने के उपाय बताए।साथ ही बत्रा ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत—दोनों पक्षों को सुनवाई का समुचित अवसर एवं कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता को न्यायिक प्रक्रिया का मूल आधार बताया।उन्होंने वाद निस्तारण की मानक प्रक्रिया,साक्ष्य परीक्षण,आदेश लेखन की संरचना, तर्कसंगत निष्कर्ष एवं अपीलीय स्तर पर आदेश की स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

उन्होंने राजस्व न्यायालय नियमावली, सिविल प्रक्रिया संहिता के प्रमुख प्रावधानों तथा राजस्थान टीनेन्सी एक्ट एवं राजस्थान भू राजस्व अधिनियम के न्यायिक प्रावधानों का क्रमबद्ध विश्लेषण प्रस्तुत किया।साथ ही यह भी बताया कि आदेश स्पष्ट,कारणयुक्त एवं विधिसम्मत होने चाहिए,जिससे अपील या पुनरीक्षण की स्थिति में न्यायालय के निर्णय की वैधानिक मजबूती बनी रहे।

कार्यशाला के दौरान अभिलेख संधारण, समुचित नोटशीट लेखन,समन एवं नोटिस की विधिवत तामील,प्रकरणों की डिजिटल मॉनिटरिंग तथा लंबित मामलों की प्रभावी समीक्षा जैसे प्रशासनिक पहलुओं पर भी विशेष चर्चा की गई। अधिकारियों द्वारा विभिन्न जिज्ञासाएँ एवं व्यावहारिक समस्याएँ रखी गईं,जिनका समाधान विशेषज्ञ वक्ता द्वारा विस्तार से किया गया।

इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को अधिक सुदृढ़, पारदर्शी एवं जनोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।यह पहल न केवल लंबित प्रकरणों के त्वरित निस्तारण में सहायक सिद्ध होगी,बल्कि आमजन के न्याय प्राप्ति के अधिकार को भी सशक्त बनाएगी।

कार्यक्रम में अतिरिक्त जिला कलक्टर जयपुर प्रथम विनीता सिंह,अतिरिक्त जिला कलक्टर द्वितीय मेघराज मीणा, अतिरिक्त जिला कलक्टर जयपुर दक्षिण युगांतर शर्मा सहित जिले के समस्त उपखण्ड अधिकारी एवं रीडर उपस्थित रहे।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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