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पहली शादी छिपाई,दूसरी को फैमिली कोर्ट ने शून्य घोषित किया:न्यायालय की टिप्पणी-हिंदू विवाह अधिनियम में सात फेरे जरूरी, पहला विवाह कानूनी रूप से गलत

जोधपुर के पारिवारिक न्यायालय संख्या-1 ने हिंदू विवाह अधिनियम की व्याख्या की और एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायाधीश सतीश चंद्र गोदारा की पीठ ने स्पष्ट किया है कि हिंदू रीति-रिवाजों के तहत होने वाले विवाह के लिए ‘सप्तपदी’ (सात फेरे) अनिवार्य कानूनी शर्त है।

कोर्ट ने निर्णय दिया कि केवल आर्य समाज मंदिर द्वारा जारी प्रमाण पत्र या विवाह पंजीकरण के आधार पर किसी विवाह को तब तक वैध नहीं माना जा सकता, जब तक कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 में वर्णित जरूरी रस्में पूरी नहीं की गई हों।

कोर्ट ने प्रार्थी महेंद्र सिंह चौहान की याचिका को स्वीकार करते हुए महिला (प्रीति सिकरवार) के पूर्व विवाह संबंध के अस्तित्व में रहते हुए और उसे छिपाकर किए गए दूसरे विवाह को गलत मानते हुए प्रार्थी के साथ हुए विवाह को शून्य घोषित कर दिया है।

प्रार्थी महेंद्र सिंह चौहान ने प्रीति के खिलाफ हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत यह केस दायर किया था।

ऑनलाइन वैवाहिक पोर्टल से संपर्क, मिला धोखा

प्रार्थी महेन्द्र सिंह के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि प्रार्थी ने अविवाहित होने के कारण ‘शादी डॉट कॉम’ के माध्यम से प्रीति सिकरवार से संपर्क किया था। दोनों परिवारों के बीच बातचीत के बाद 2 फरवरी 2017 को एक लिखित इकरारनामा तैयार किया गया, जिसमें दोनों पक्षों को अविवाहित बताया गया। इसके बाद 5 फरवरी 2017 को दोनों का हिंदू रीति-रिवाज से शादी हुई।

वकील ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद प्रार्थी को पता चला कि प्रीति सिकरवार ने उससे विवाह करने से पहले रणजीत कुमार विद्यार्थी (अप्रार्थी संख्या 2) के साथ 8 फरवरी 2011 को आर्य समाज मंदिर, रामबाग स्कीम, महामंदिर, जोधपुर में शादी की थी। प्रार्थी के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि प्रीति का पहला विवाह कानूनी रूप से अस्तित्व में था और उसका कोई विच्छेद नहीं हुआ था, इसलिए प्रार्थी के साथ उसका दूसरा विवाह विधिक रूप से शून्य है।

सप्तपदी के बिना विवाह की कानूनी स्थिति

मामले की सुनवाई के दौरान अप्रार्थी प्रीति सिकरवार ने रणजीत कुमार के साथ किसी भी वैध विवाह से इनकार किया। हालांकि, कोर्ट ने प्रार्थी द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों और फोटो साक्ष्यों पर विचार किया। जोधपुर फैमिली कोर्ट ने इस कानूनी पहलू पर विस्तृत चर्चा की कि क्या आर्य समाज में हुआ कथित पहला विवाह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘वैध’ था या नहीं।

न्यायाधीश गोदारा ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ‘श्रुति अग्निहोत्री बनाम आनंद कुमार’ मामले के न्यायिक दृष्टांत का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के अनुसार, एक वैध विवाह के लिए परंपरागत रीति-रिवाज और विशेष रूप से सप्तपदी (अग्नि के समक्ष सात फेरे) का होना अनिवार्य है। कोर्ट ने माना कि आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र स्वयं में विवाह का पूर्ण विधिक प्रमाण नहीं है, यदि मूल धार्मिक संस्कार संपन्न नहीं हुए हों।

दहेज और क्रूरता के आरोप-प्रत्यारोप

सुनवाई के दौरान अप्रार्थी प्रीति सिकरवार ने प्रार्थी और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए। उसके वकील ने तर्क दिया कि सगाई और शादी के समय उसके माता-पिता ने भारी मात्रा में आभूषण और नकद राशि दी थी। प्रीति ने यह भी आरोप लगाया कि उसे अतिरिक्त दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उसका गर्भपात कराने की कोशिश की गई। कोर्ट ने नोट किया कि इस संबंध में न्यायालय पीसीपीएनडी जोधपुर महानगर ने 27 जनवरी 2020 को धारा 498ए और 406 के तहत प्रसंज्ञान ले रखा है और वह मामला अलग से विचाराधीन है।

पूर्व विवाह के तथ्यों को छुपाया, दूसरी शादी शून्य

लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के अवलोकन के बाद, पारिवारिक न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि प्रीति सिकरवार ने अपने पूर्व विवाह के तथ्यों को छुपाकर प्रार्थी महेन्द्रसिंह से विवाह किया था। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अप्रार्थिया का पूर्व विवाह विधिक रूप से विच्छेदित नहीं हुआ था।

न्यायाधीश सतीश चन्द्र गोदारा ने प्रार्थी महेन्द्रसिंह चौहान के हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत प्रार्थना पत्र स्वीकार करते हुए प्रार्थी और अप्रार्थी प्रीति सिकरवार के बीच 5 फरवरी 2017 को हुए विवाह को शून्य घोषित कर दिया।

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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