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पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र; राजस्थान की जनकल्याणकारी योजनाओं एवं प्रोजेक्ट्स को बंद करने पर जताई गहरी चिंता

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 28 फरवरी को प्रस्तावित अजमेर दौरे से पूर्व उन्हें एक विस्तृत पत्र लिखकर प्रदेश की जनहितकारी योजनाओं की स्थिति पर गहरा रोष व्यक्त किया है। अशोक गहलोत ने प्रधानमंत्री को उनके ‘चित्तौड़गढ़ वाले वादे’ की याद दिलाते हुए इन योजनाओं को पुनः बहाल करने की मांग की है।

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र का पूर्ण विवरण:

अशोक गहलोत ने अपने पत्र में निम्नलिखित तथ्यों को साझा किया है:

“प्रिय नरेन्द्र मोदी जी,

आगामी 28 फरवरी को राजस्थान की पावन धरा अजमेर में आपके आगमन पर हार्दिक स्वागत है. मैं इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान उस ‘गारंटी’ की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ, जो आपने 2 अक्टूबर 2023 को चित्तौड़गढ़ की पावन धरा से राजस्थान की जनता को दी थी.

2023 में मैंने राजस्थान की जनता को आगाह किया था कि यदि भाजपा सरकार में आ गई, तो कांग्रेस सरकार की योजनाओं को बंद कर देगी. तब आपने 2 अक्टूबर 2023 को स्पष्ट शब्दों में भरोसा दिलाया था कि “भाजपा सरकार बनने पर कांग्रेस की किसी भी जनहितकारी योजना को बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें और बेहतर बनाया जाएगा”. राजस्थान की जनता ने आपके इन शब्दों को ‘मोदी की गारंटी’ मानकर स्वीकार किया था.

परंतु अत्यंत खेद का विषय है कि वर्तमान राज्य सरकार आपके उस वादे के ठीक विपरीत कार्य कर रही है. पिछले दो वर्षों में प्रदेश की वे तमाम योजनाएँ, जो देशभर में मॉडल के रूप में जानी जाती थीं और कई अन्य राज्यों ने जिन्हें अपने यहाँ लागू किया, उन्हें या तो बंद कर दिया गया है या बजट एवं शर्तों में कटौती कर निष्प्रभावी बना दिया गया है. इससे राजस्थान की जनता बेहद परेशान है. मैं आपका ध्यान इन प्रमुख बिंदुओं की ओर दिलाना चाहता हूँ:

राइट टू हेल्थ (Right to Health): देश का पहला स्वास्थ्य का अधिकार कानून बनने के बाद भी वर्तमान सरकार ने इसके नियम (Rules) लागू नहीं किए हैं, जिससे जनता को मुफ्त इलाज का कानूनी अधिकार नहीं मिल पा रहा है.

गिग वर्कर्स वेलफेयर एक्ट: ऑनलाइन डिलीवरी पार्टनर्स की सामाजिक सुरक्षा के लिए बनाया गया यह क्रांतिकारी कानून ठंडे बस्ते में पड़ा है. न बोर्ड बना और न ही फंड का लाभ संबंधित लोगों तक पहुँचा.

राजीव गांधी स्कॉलरशिप फॉर एकेडमिक एक्सीलेंस: इसका नाम बदलने के साथ ही लाभार्थियों की संख्या 500 से घटाकर मात्र 150 कर दी गई है, जिससे मेधावी छात्रों के विदेश में पढ़ने के अवसर सीमित हो गए हैं.

इंदिरा रसोई योजना: इसका नाम बदलकर ‘अन्नपूर्णा रसोई’ किया गया, लेकिन केंद्रों पर कुप्रबंधन के कारण लाभार्थियों की संख्या पहले से लगभग आधी रह गई है.

इंदिरा गांधी स्मार्टफोन योजना: महिलाओं को डिजिटल सशक्तिकरण देने वाली यह योजना दूसरे चरण में पूरी तरह बंद कर दी गई है.

इंदिरा गांधी शहरी रोजगार गारंटी योजना: मनरेगा की तर्ज पर शहरों में 125 दिन का रोजगार देने वाली इस योजना का क्रियान्वयन धरातल पर अब लगभग शून्य है.

चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा एवं RGHS: इन दोनों योजनाओं में अस्पतालों एवं मेडिकल स्टोर्स को समय पर भुगतान नहीं किए जाने के कारण ये योजनाएँ बार-बार संकट में आ जाती हैं.

नि:शुल्क बिजली योजना (100 यूनिट): इसे ‘पीएम सूर्य घर योजना’ की जटिल शर्तों से जोड़ दिया गया है. नए उपभोक्ताओं को इसका लाभ नहीं मिल रहा, जिससे मध्यम वर्ग की राहत समाप्त हो गई है.

अन्नपूर्णा राशन किट: महंगाई से राहत देने वाले इन किटों का वितरण पूरी तरह बंद कर दिया गया है.

इंदिरा गांधी क्रेडिट कार्ड योजना: बिना ब्याज के 50,000 रुपये का ऋण देने वाली इस योजना में नए आवेदन लेना बंद कर दिया गया है.

प्रधानमंत्री जी, भाजपा सरकार की अदूरदर्शिता के कुछ उदाहरण आपकी जानकारी में लाना चाहता हूँ. हमारी कांग्रेस सरकार के समय जयपुर में बने महात्मा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ गवर्नेंस एंड सोशल साइंसेज़ का निर्माण पूरा होने के एक वर्ष बाद भी इसका लोकार्पण नहीं किया गया है. जयपुर में ही कोचिंग संस्थानों को एक स्थान पर लाने तथा कोचिंग संस्थानों की भीड़ से लगने वाले ट्रैफिक जाम से बचाव के लिए नए कोचिंग हब का निर्माण करवाया गया था. भाजपा सरकार न तो कोचिंग संस्थानों को वहाँ स्थानांतरित करवा पाई और न ही इस परियोजना का उचित उपयोग कर सकी. अपनी नाकामी छिपाने के लिए इस कोचिंग हब को आईआईटी जोधपुर के रीजनल सेंटर हेतु दे दिया गया, जिससे जयपुर में ट्रैफिक जाम की समस्या और विकट हो गई है.

मेडिकल सुविधाओं की बात करें तो देश के पहले सुपरस्पेशियलिटी आईपीडी टावर का कार्य अब तक पूरा हो जाना चाहिए था, परंतु सत्ता परिवर्तन के बाद वहाँ एक नई मंजिल तक नहीं बन सकी है. जयपुर शहर के अस्पतालों पर दबाव कम करने तथा सड़क दुर्घटनाओं में त्वरित उपचार के लिए कानोता (आगरा रोड) और अचरोल (दिल्ली रोड) में सैटेलाइट अस्पताल खोलने की घोषणा की गई थी. भूमि आवंटन के बावजूद वर्तमान सरकार ने इन दोनों अस्पतालों को रद्द कर दिया है. वहीं शिवदासपुरा और बालमुकुंदपुरा के अस्पताल तैयार होने के एक वर्ष बाद भी जनता को समर्पित नहीं किए गए हैं.

यदि जोधपुर की बात करें तो वहाँ भी स्थिति कमोबेश ऐसी ही है. चौपासनी हाउसिंग बोर्ड अस्पताल, प्रताप नगर अस्पताल, डिगाड़ी अस्पताल समेत कई इमारतें बनकर तैयार हैं, परंतु आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराकर इन्हें शुरू नहीं किया जा रहा है. जोधपुर में राजस्थान स्टेट स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट बनकर तैयार है, परंतु न तो कोच एवं विशेषज्ञों की नियुक्ति की गई है और न ही इसके लोकार्पण को लेकर कोई स्पष्टता है. ऐतिहासिक सुमेर लाइब्रेरी का काम पूरा होने के बाद भी शुरू नहीं किया गया है. प्रदेश में नई पीढ़ी की शिक्षा देने के लिए बनाए जा रहे राजीव गांधी फिनटेक इंस्टीट्यूट का कार्य भी अपेक्षित गति से धीमा चल रहा है.

कांग्रेस सरकार के दौरान कोटा में देश का सबसे आकर्षक रिवर फ्रंट बनाया गया, जिसकी चर्चा देश-दुनिया में हुई. वर्तमान सरकार ने इसके रखरखाव तथा आगे के चरणों का कार्य भी रोक दिया है.

यह तो केवल कुछ उदाहरण हैं। पूरे राजस्थान में यदि जिला-वार जानकारी दी जाए, तो ऐसे दर्जनों उदाहरण सामने आएँगे.

लोकतंत्र में ‘जनता का विश्वास’ सबसे बड़ी पूंजी होता है. जब आप 28 फरवरी को अजमेर की जनता के बीच उपस्थित हों, तो मेरा आपसे सादर आग्रह है कि आप अपने उस ‘चित्तौड़गढ़ वाले वादे’ का मान रखें.

मेरी आपसे विनम्र मांग है कि अजमेर की इस सभा में आप प्रदेश सरकार को स्पष्ट निर्देश दें कि पूर्ववर्ती सरकार की इन तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं और रद्द किए गए प्रोजेक्ट्स को उनके मूल स्वरूप में पुनः बहाल किया जाए, ताकि राजस्थान की जनता स्वयं को ठगा हुआ महसूस न करे.

आशा है कि आप राजस्थान की जनता के हितों और अपने शब्दों की मर्यादा को सर्वोपरि रखेंगे.”

Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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