जब मां की कोख में थे तो पिता चल बसे। संघर्षों के बीच जैसे तैसे कर मां ने बड़ा किया। कुछ साल स्कूल में तो कुछ समय घर पर रहकर ही बीए तक पढ़ाई की। पढ़ाई छोड़ने के बाद मां के साथ खेती में हाथ बंटाना शुरू किया और छोटे से खेत में अब इतने नवाचार कर दिए कि जैसे किसी बड़े संस्थान से इंजीनियरिंग की डिग्री ले रखी हो। यह कर दिखाया है
चित्तौड़गढ़ जिले के एक छोटे से गांव जयसिंहपुरा के 27 वर्षीय युवा किसान नारायणलाल धाकड़ ने। साबित किया कि खेती को केवल मेहनत से नहीं, बल्कि धैर्य और नवाचार से लाभकारी बनाया जा सकता है। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े नारायण ने अपनी साढ़े तीन हेक्टेयर भूमि को ही एक तरह से प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है।
पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और केमिकल के अंधाधुंध इस्तेमाल से घटते मुनाफे को देख नारायण ने तय किया कि वे लीक से हटकर काम करेंगे। कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क में आए और अपने खेत को हनुमंत फार्म्स का नाम दिया। यहां खेती की लागत कम करने और ज्यादा उत्पादन के लिए प्रयोग शुरू किए। इंटरनेट और अपने अनुभव से कई मशीनें और तकनीकें विकसित कीं। ये न केवल वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं बल्कि आम किसान की पहुंच में हैं। भविष्य में नाबार्ड की मदद से किसानों तक पहुंचाई जाएगी।
सबसे पहले बनाई मोटर
सबसे पहले मोटर चलित चना प्रूनिंग मशीन बनाई। चने की फसल में अधिक पैदावार के लिए ऊपरी कली को तोड़ना जरूरी होता है ताकि पौधा ऊपर बढ़ने के बजाय नीचे से अधिक शाखाएं फैला सके। अब तक किसान खुद करते रहे हैं, जिसमें समय और पैसा दोनों अधिक लगते हैं। मगर नारायण ने एक छोटी डीसी मोटर और ब्लेड का उपयोग कर एक हाथ से चलने वाली मशीन बनाई।
इस प्रयोग से उनके खेत में चने की पैदावार में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वहीं, नीलगाय और जंगली जानवरों द्वारा फसल बर्बाद करना किसानों की बड़ी समस्या है। इसके समाधान के लिए सोलर 360 डिग्री रोटेटिंग नीलगाय रक्षक यंत्र बनाया। सौर ऊर्जा से चलने वाला यह यंत्र रात भर डरावनी आवाजें और चारों दिशाओं में घूमने वाली तेज रोशनी के जरिए जानवरों को खेत से दूर रखता है। इसी तरह तेल के खाली डिब्बों से देसी लाइट ट्रैप बनाया। यह बिना किसी महंगे कीटनाशक के कीटों को आकर्षित कर नष्ट कर देता है।
इसी तरह खरपतवार हटाने के लिए पुरानी साइकिल से वीडर बना दिया। इससे मजदूरों पर होने वाले खर्च को 80 प्रतिशत तक कम कर दिया है। इन उपकरणों के अलावा नारायण ने कपास और शकरकंद का एक ऐसा इंटरक्रॉपिंग मॉडल विकसित किया है, जो जमीन की नमी को बनाए रखता है। खरपतवार को उगने ही नहीं देता।
2026 में हो चुके सम्मानित
साथ ही, जैविक फफूंदनाशी ‘ट्राइकोडर्मा’ के प्रयोग से मिट्टी को पुनर्जीवित कर रहे हैं। उनकी इन्हीं उपलब्धियों के कारण वर्ष 2026 में उन्हें महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर द्वारा सम्मानित किया गया है। इससे पहले वे कृषि सम्मान, मेवाड़ फाउंडेशन का महाराजा राजसिंह अवॉर्ड और आईसीएआर दिल्ली से भी सम्मानित हो चुके हैं।
अब वे न केवल अपने खेत में शोध कर रहे हैं, बल्कि किसानों को आधुनिक खेती का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली के वैज्ञानिकों के संपर्क में हैं और भविष्य में दलहन के क्षेत्र में नए बीजों के संवर्धन और प्रसंस्करण पर एक बड़ा शोध केंद्र स्थापित करना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि उनका लक्ष्य है कि भारतीय किसान तकनीक के मामले में इतना सक्षम बने कि उसे लगने लगे कि खेती ही सबसे लाभदायक काम है।
उन्होंने बताया कि जब वह जन्मा ही नहीं था तब पिता जीतमल धाकड़ का निधन हो गया था लेकिन मां सीताबाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने खेतों में पसीना बहाकर परिवार को संभाला। मुझे भी पढ़ाया। सफलता का श्रेय भी मां के अटूट हौसले को ही है।






