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ज्यादा ब्याज देने वाले पोस्टमास्टर से 1.48 लाख वसूली सही:हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला रद्द किया, कहा- विभागीय नुकसान की पूर्ति जरूरी

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने बुधवार को डाक विभाग के एक पोस्टमास्टर को झटका देते हुए ट्रिब्यूनल (CAT) के आदेश को रद्द कर, विभाग द्वारा 1,48,599 रुपए की वसूली को वैध करार दिया। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस बिपिन गुप्ता की डिवीजन बेंच ने आदेश में स्पष्ट किया कि मासिक आय योजना (MIS) के तहत अधिकतम सीमा से अधिक राशि पर गलत ब्याज देने वाले पोस्टमास्टर को इस नुकसान की भरपाई करनी होगी।​

दरअसल, पाली के बलुंदा निवासी सोहनलाल रेगर, जो मारवाड़ जंक्शन पोस्ट ऑफिस में पोस्टल असिस्टेंट के रूप में कार्यरत हैं। आनंदपुर कालू पोस्ट ऑफिस में सब-पोस्टमास्टर के पद पर कार्यरत रहते हुए उन्हें 16 सीसीए के तहत चार्जशीट दी गई थी।​ आरोप था कि उन्होंने MIS अकाउंट बंद कर खाताधारक को नियम विरूद्ध ज्यादा ब्याज का भुगतान किया। जांच के बाद, 28 मार्च 2018 के आदेश में अधिक भुगतान की गई 1,48,599 रुपए की राशि की वसूली का दंड दिया गया।​

अपील और ट्रिब्यूनल का निर्णय

28 मार्च 2018 के वसूली आदेश के खिलाफ रेगर ने डाक सेवा निदेशक के समक्ष अपील की। 27 सितंबर 2018 को यह अपील खारिज कर दी गई। तब रेगर ने वसूली व अपील खारिज के आदेशों के खिलाफ ट्रिब्यूनल का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने 23 जनवरी को विभाग के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। ट्रिब्यूनल के इसी आदेश के खिलाफ विभाग ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।​

केंद्र का तर्क: आरोप सिद्ध, वसूली का दंड अवैध नहीं

विभाग के वकील ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल का आदेश उचित नहीं है। क्योंकि रेगर के खिलाफ लगाया गया आरोप साबित हो गया था और उससे वसूली का दंड लगाने में कोई अवैधता नहीं थी।​ वकील ने बताया कि –

  • MIS के तहत राशि जमा करने के लिए एक अधिकतम सीमा है। जबकि, तय सीमा से ज्यादा राशि पर MIS की दर से ब्याज दिया गया। सीमा से अधिक दी गई इसी ब्याज राशि की वसूली की डिमांड की गई है।​
  • ऐसे खातों पर ब्याज राशि वितरित करने से पहले खातों की जांच करना रेगर का बाध्यकारी कर्तव्य था। उसे यह देखना चाहिए था कि MIS के तहत जमा की गई राशि तय सीमा से ज्यादा है। जबकि, उपभोक्ता केवल तय सीमा तक ही MIS के अनुसार ब्याज का हकदार है। उससे अधिक जमा की गई राशि पर सेविंग अकाउंट की ब्याज दर से ब्याज की गणना करनी थी। ​
  • चूंकि प्रतिवादी रेगर ने उपभोक्ता को ब्याज की राशि का भुगतान करने में सावधानी नहीं बरती, इसलिए विभाग को नुकसान हुआ। इस कार्रवाई करने से पहले रेगर को सुनवाई का अवसर भी दिया गया था। इसके बाद दंड लगाया गया है।​
  • ब्याज राशि के डिस्ट्रीब्यूशन के इस मामले में कोई अन्य व्यक्ति शामिल नहीं था। इसलिए ट्रिब्यूनल ने गलत तरीके से माना कि जो अन्य व्यक्ति खाता खोलने और मामले से निपटने में शामिल थे, उन्हें भी वर्तमान मामले में भुगतान की गई अतिरिक्त राशि लौटाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए था।​

प्रतिवादी: दूसरे कार्मिक ने खोला था खाता

  • प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि MIS खाता ही पोस्ट ऑफिस के किसी अन्य कर्मचारी द्वारा अनियमित रूप से खोला गया था। प्रतिवादी रेगर ने केवल MIS के तहत जमा राशि पर ब्याज का भुगतान किया है।​
  • चूंकि पोस्ट ऑफिस में जमा राशि का उपयोग विभाग द्वारा किया गया था, इसलिए अतिरिक्त राशि का भुगतान करने के लिए प्रतिवादी पर कोई दायित्व नहीं डाला जा सकता है। ब्याज के भुगतान करने में प्रतिवादी की ओर से कोई गलती नहीं थी, क्योंकि उसने ब्याज की गणना की और मासिक आय योजना (MIS) के अनुसार राशि का भुगतान किया।​

हाईकोर्ट: तय सीमा से ज्यादा भुगतान की पुष्टि

खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के साथ ही मामले के प्रासंगिक रिकॉर्ड को देखा। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड से यह सामने आया है कि प्रतिवादी रेगर ने 11 मई 2012 को आनंदपुर कालू पोस्ट ऑफिस में सब-पोस्टमास्टर के पद पर काम करते हुए MIS में खोले गए खातों की राशि को स्वीकार्य सीमा से अधिक ब्याज का भुगतान किया था।​

  • कोर्ट ने ऑफिस सेविंग बैंक मैनुअल के नियमों का हवाला दिया, जो डिस्ट्रीब्यूशन ऑफिसर के दायित्व स्पष्ट करते हैं। इनमें स्पष्ट है कि यदि किसी जमाकर्ता ने पोस्ट ऑफिस मासिक आय योजना के तहत निर्धारित सीमा से अधिक निवेश किया है, तो निर्धारित सीमा से अधिक जमा को पोस्टमास्टर द्वारा POSB ब्याज दर के साथ जमाकर्ता को वापस कर दिया जाएगा।​
  • कोर्ट ने कहा कि चूंकि प्रतिवादी ने उपभोक्ता द्वारा जमा की गई पूरी राशि पर ब्याज की गणना की, इसलिए भुगतान किया गया ब्याज गलत तरीके से गणना किया गया था। MIS की स्वीकार्य सीमा से अधिक भुगतान करके नियमों का उल्लंघन किया गया था।​
  • कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि – चूंकि प्रतिवादी कानून के अनुसार राशि की गणना करने में विफल रहा, जिससे विभाग को नुकसान हुआ, इसलिए वह निश्चित रूप से उपभोक्ता को अधिक भुगतान की गई राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी था। उसकी लापरवाही से ही विभाग को नुकसान हुआ है। याचिकाकर्ता-विभाग द्वारा की गई कार्रवाई भी MIS के नियम 168(7) और (8) के अनुरूप है।​
  • चूंकि विभाग ने मामले में कार्यवाही की और आरोप पत्र जारी किया और प्रतिवादी को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद एक तर्कसंगत और विस्तृत आदेश पारित किया, इसलिए यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है। इसलिए अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने अतिरिक्त राशि की वसूली के लिए सही तरीके से आदेश दिया है।
  • कोर्ट ने कहा कि भले ही कोई व्यक्ति जिसने MIS के लिए नियमों के विपरीत खाते खोले हों, वह प्रतिवादी-कर्मचारी को मुक्त करने का आधार नहीं हो सकता, क्योंकि उपभोक्ता को ब्याज राशि के वितरण से पहले जांच करना प्रतिवादी का कर्तव्य था। इसलिए अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा प्रतिवादी पर लगाया गया दंड का आदेश उचित, सही और सही था।​
  • कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा 23 जनवरी को पारित आदेश को रद्द कर दिया।​
Kashish Bohra
Author: Kashish Bohra

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