राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि भारत में किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन विदेशी नागरिकों को भी उपलब्ध है, जो भारत के नागरिक नहीं है।
संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। वहीं, निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार भी अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है। जस्टिस अनूप ढंढ की अदालत ने यह आदेश किडनी ट्रांसप्लांट केस में पकड़े गए दो बांग्लादेशी नागरिकों नुरूल इस्लाम और एमडी अहसानुल कोबिर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।
सरकारी गवाह बनने पर नहीं मिल रही जमानत
दरअसल, किडनी ट्रांसप्लांट केस में जवाहर सर्किल थाना पुलिस ने 23 अप्रेल 2024 को दोनों बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया था। दोनों पर आरोप है कि इनके बीच रक्त संबंध नहीं होने के बाद भी इन्होंने किडनी ट्रांसप्लांट का लाभ लिया।
दोनों की ओर से याचिका में कहा गया कि पकड़े जाने के बाद हम सरकारी गवाह बन गए। हमारी जानकारी पर पुलिस ने पूरे रैकेट का पर्दाफाश किया। मामले में मुख्य आरोपी को भी जमानत मिल चुकी है। केस में आज तक आरोप भी फ्रेम नहीं हुए है। वहीं, हमारी गिरफ्तारी को डेढ़ साल का समय बीत चुका है।
इनकी याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि कानून में सरकारी गवाह के स्टेटमेंट रिकॉर्ड होने से पहले उसे जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता है। इस बिंदू को राजस्थान हाईकोर्ट की लार्जर बैंच भी स्थापित कर चुकी है।
ट्रायल कोर्ट की सराहना नहीं कर सकते
हाईकोर्ट ने कहा- कानूनी प्रावधानों के तहत बिना स्टेटमेंट रिकॉर्ड हुए सरकारी गवाह को जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता है। लेकिन केस का दूसरा पहलू यह भी है कि इस मामले में आरोपी करीब डेढ़ साल से कस्टडी में है।
मामले में चालान पेश हो चुका है। लेकिन आज तक ट्रायल कोर्ट ने चार्ज भी फ्रेम नहीं किए है। ऐसे में हम ट्रायल कोर्ट की सराहना नहीं कर सकते हैं।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह अगले चार सप्ताह में चार्ज फ्रेम करें। वहीं, प्रमुखता से याचिकाकर्ताओं के स्टेटमेंट रिकॉर्ड करें। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं को छूट दी है कि स्टेटमेंट रिकॉर्ड होने के बाद वह नए सिरे से जमानत के लिए याचिका दायर कर सकते हैं।






