झारखंड की वादियों में जहाँ विकास के बड़े-बड़े दावे गूँज रहे हैं, वहीं एक बड़ी आबादी ऐसी भी है जिसकी आवाज़ न तो सत्ता के गलियारों तक पहुँच रही है और न ही समाज के बंद दरवाजों के पीछे। ये हैं ऑटिज्म और अन्य गंभीर विकलांगताओं से जूझते मासूम बच्चे। राज्य में ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों की स्थिति आज एक ऐसी त्रासदी बन चुकी है, जिस पर सरकार ने अपनी आँखें मूँद ली हैं और सामाजिक संगठनों ने भी इसे अपने एजेंडे से बाहर कर दिया है। आंकड़ों पर गौर करें तो झारखंड में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की संख्या काफी अधिक है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन हजारों बच्चों के लिए राज्य के सरकारी स्कूलों में स्पेशल एजुकेटर्स (विशेष शिक्षकों) की संख्या महज नहीं के बराबर है। जब शिक्षक ही नहीं होंगे, तो ऑटिज्म जैसी जटिल स्थिति वाले बच्चे समाज की मुख्यधारा से कैसे जुड़ पाएंगे?
बताते चलें कि केवल फाइलों की शोभा
कहने को तो कई अभियान’ और योजनाएं हैं, लेकिन धरातल पर ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों के लिए ‘अर्ली इंटरवेंशन सेंटर’ (जल्द उपचार केंद्र) न के बराबर हैं। रांची और जमशेदपुर जैसे एक-दो शहरों को छोड़ दें, तो ग्रामीण झारखंड में ऑटिज्म को आज भी ‘ऊपरी साया’ या ‘मानसिक पागलपन’ समझकर झाड़-फूँक का सहारा लिया जा रहा है।
सरकार ने दिव्यांगता प्रमाण पत्र की प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया है कि एक गरीब पिता अपने बच्चे को लेकर अस्पताल दर अस्पताल भटकने के बाद अंततः हार मानकर घर बैठ जाता है।
दुखद पहलू यह भी है कि राज्य के बड़े-बड़े एनजीओ जो जल, जंगल और ज़मीन पर बड़े सेमिनार करते हैं, उन्होंने भी इन बच्चों को हाशिए पर छोड़ दिया है। ऑटिज्म के क्षेत्र में काम करना कठिन और लंबे धैर्य का काम है। शायद इसीलिए ‘फंडिंग’ और ‘ग्लेमर’ की तलाश में भटकते कई सामाजिक संगठनों के लिए ये बच्चे प्राथमिकता में नहीं हैं।
एक पिता ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि मेरे एक 8 वर्षीय बेटे को ऑटिज्म है।
मेरा बच्चा न बोलता है, न हमारी सुनता है। डॉक्टर कहते हैं इसे थेरेपी की ज़रूरत है, लेकिन एक घंटे की थेरेपी की फीस 800 रुपये है। मेरी दिहाड़ी 300 रुपये है। सरकार से मदद मांगी तो उन्होंने कहा कि पहले सर्टिफिकेट बनवाओ, जो पिछले दो साल से नहीं बन पाया। कई चिकित्सकों के बातचीत करने के बाद निष्कर्ष निकला कि
ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है जिसे सही समय पर थेरेपी और शिक्षा देकर सुधारा जा सकता है। लेकिन झारखंड में यह “सही समय” सरकारी फाइलों और सिस्टम की सुस्ती के बीच दम तोड़ रहा है।
अगर सरकार ने जल्द ही विशेष शिक्षकों की बहाली, ज़िला स्तर पर आधुनिक पुनर्वास केंद्रों की स्थापना और जागरूकता अभियान शुरू नहीं किया, तो ये बच्चे अपनी ही दुनिया में कैद होकर रह जाएंगे। समाज और सरकार को यह समझना होगा कि ये बच्चे दया के नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के पात्र हैं। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं)






